बहुत अच्छा। यह एक विस्तृत और महत्वपूर्ण पाठ है। मैं इसका हिन्दी में अनुवाद करूँगा, आपकी दी गई संरचना और संख्यांकन को बनाए रखते हुए। यह प्रत्येक प्रतिज्ञा के अर्थ को व्यक्त करने पर केंद्रित एक सीधा अनुवाद होगा।
《करुणापुण्डरीक सूत्र》 लिंक: http://cbeta.buddhism.org.hk/xml/T03/T03n0157_001.xml निम्नलिखित, आपके अनुरोध के अनुसार, 《करुणापुण्डरीक सूत्र》 के छठे और सातवें खंड में रत्नसागर ब्राह्मण की "पाँच सौ प्रतिज्ञाओं" और उनकी अनुवर्ती पूरक महाप्रतिज्ञाओं (जो "हे भगवन्! मैं अब स्वयं षट्पारमिताओं का अभ्यास करके सत्त्वों का दमन करूँगा..." से शुरू होकर चक्रवर्ती पवित्र राजा के बोलने से पहले तक) की पूर्ण संरचित सूची है।
2. रत्नसागर ब्राह्मण के पाँच सौ प्रणिधानों का मुख्य भाग - महाप्रणिधानों की संख्या: 518
3. पूरक महाप्रणिधान - महाप्रणिधानों की संख्या: 96
《करुणापुण्डरीक सूत्र》 छठा और सातवाँ खंड: रत्नसागर ब्राह्मण के महाप्रणिधानों का विस्तृत विवरण
प्रस्तावना: हे सुपुरुष! रत्नसागर ब्राह्मण ने यह गाथा कहकर बुद्ध की स्तुति की, उस समय सभी उपस्थित जनसमूह ने प्रशंसा करते हुए कहा: ‘साधु! साधु! हे महापुरुष! आप धर्मों के वास्तविक, अद्भुत एवं श्रेष्ठ स्वरूप की भली-भाँति स्तुति करने में सक्षम हैं।’
1. बोधिसत्त्व मार्ग का अनुसरण तथा बुद्धत्व प्राप्त कर प्राणियों का उद्धार करने का प्रणिधान ("पाँच सौ प्रणिधानों" का मुख्य विषय)
1.1. बोधिसत्त्व चर्या का सामान्य प्रणिधान एवं षट्पारमिताओं का प्रणिधान
1.1.1. पंचकषाय युक्त दुष्ट युग के पापी, दुःखी प्राणियों का परित्याग न करने का मूल प्रणिधान (1). भविष्य के जन्मों में भी, एक गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के बीतने पर, दूसरे गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के उत्तरार्ध में प्रवेश करने पर, भद्रकल्प में जब मनुष्यों की आयु एक हजार वर्ष होगी, तब मैं बोधिसत्त्व मार्ग का अनुसरण करूँगा। (2). (तब मैं) लंबे समय तक जन्म-मरण में रहकर अनेक दुःख सहन करूँगा। (3). (तब मैं) बोधिसत्त्वों की समाधि-शक्ति के कारण, निश्चय ही ऐसे (पंचकषाय युक्त दुष्ट युग के घोर क्लेशों से युक्त, पंचानन्तर्य कर्म करने में सक्षम, सद्धर्म का विनाश करने वाले, आर्यजनों की निंदा करने वाले, मिथ्या दृष्टि रखने वाले, आर्यों के सात धनों से रहित, माता-पिता के प्रति अनादरपूर्ण, श्रमणों एवं ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धाहीन, अकरणीय कार्य करने वाले, करणीय कार्य न करने वाले, पुण्य कर्म न करने वाले, परलोक से न डरने वाले, तीन पुण्य क्षेत्रों में कर्म करने की इच्छा न रखने वाले, स्वर्ग एवं मनुष्य लोक के फल की कामना न करने वाले, दस अकुशल कर्मों में संलग्न, तीन अकुशल गतियों की ओर प्रवृत्त, कल्याण मित्रों से दूर, यथार्थ प्रज्ञा के निकट न जाने वाले, त्रैधातुक संसार रूपी कारागार में पड़े, चार प्रवाहों में बहते हुए राख की नदी में डूबे, अज्ञान से अंधे, सभी कुशल कर्मों से रहित, केवल अकुशल कर्म करने वाले। ऐसे प्राणी, जिन्हें सभी बुद्धक्षेत्र स्वीकार नहीं करते, इसलिए इस लोक में बहिष्कृत कर दिए गए हैं, कुशल कर्मों से रहित होने के कारण, अकुशल कर्म करते हुए, मिथ्या मार्ग पर चलकर, पर्वत के समान भारी पापों के ढेर से युक्त) प्राणियों का परित्याग नहीं करूँगा।
1.1.2. दानपारमिता (दान) के अभ्यास का प्रणिधान (4). हे भगवन्! मैं अब स्वयं षट्पारमिताओं का अभ्यास करके सत्त्वों का दमन करूँगा। (5). जब मैं दानपारमिता का अभ्यास करूँगा, यदि कोई प्राणी जन्म-जन्मान्तर में मुझसे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ माँगे, तो उसकी माँग के अनुसार, मैं उसे अवश्य ही भोजन-पानी प्रदान करूँगा। (6). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) औषधि। (7). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) वस्त्र। (8). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) शय्या। (9). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) आवास, ग्राम। (10). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) पुष्प, सुगंध। (11). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) मालाएँ। (12). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) शरीर पर लगाने का सुगंधित लेप। (13). (अवश्य ही) रोगियों को औषधि प्रदान करूँगा। (14). (अवश्य ही रोगियों को) परिचारक प्रदान करूँगा। (15). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) ध्वजाएँ। (16). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) छत्र। (17). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) धन। (18). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) अनाज, रेशम। (19). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) हाथी, घोड़े। (20). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) वाहन। (21). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) सोना, चाँदी। (22). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) मुद्राएँ। (23). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) मोती। (24). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) वैडूर्य। (25). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) स्फटिक। (26). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) शंख, कौड़ी। (27). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) जेड, रत्न। (28). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) प्रवाल। (29). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) सच्चे रत्न। (30). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) नकली रत्न। (31). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) मुकुट। (32). (अवश्य ही प्रदान करूँगा) चँवर, आभूषण। (33). इस प्रकार की वस्तुएँ, मैं सभी प्राणियों, यहाँ तक कि निर्धनों के प्रति भी, महाकरुणा का भाव रखकर सब कुछ दान कर दूँगा। (34). यद्यपि ऐसा दान करूँगा, तथापि स्वर्ग या मनुष्य लोक के फल की कामना नहीं करूँगा। (35). केवल प्राणियों के दमन एवं संग्रह के लिए, इस कारण से, अपनी सभी सम्पत्ति का त्याग करूँगा। (36). यदि कोई प्राणी अत्यधिक मात्रा में माँगे, जैसे दास-दासी, ग्राम, नगर, पत्नी, बच्चे, हाथ-पैर, नाक-जीभ, सिर-आँखें, त्वचा-रक्त, अस्थि-मांस, शरीर-प्राण, इस प्रकार की अत्यधिक वस्तुएँ माँगे, तो उस समय मैं महाकरुणा का भाव उत्पन्न करूँगा, और इन सभी वस्तुओं को दान में दे दूँगा। (37). (अत्यधिक वस्तुओं का दान करते समय) फल की कामना नहीं करूँगा। (38). (अत्यधिक वस्तुओं का दान करते समय) केवल प्राणियों के दमन एवं संग्रह के लिए। (39). हे भगवन्! जब मैं दानपारमिता का अभ्यास करूँगा, (तो मेरी कामना है कि) अतीत के बोधिसत्त्वों द्वारा किए गए दानपारमिता के अभ्यास से वह श्रेष्ठ हो। (40). (मेरी कामना है कि) भविष्य के बोधिसत्त्व जो अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न करेंगे और दानपारमिता का अभ्यास करेंगे, वे भी उससे श्रेष्ठ न हो सकें। (41). हे भगवन्! मैं भविष्य में बोधिसत्त्व मार्ग का अनुसरण करने के लिए, सौ हजार करोड़ कल्पों तक इस प्रकार दानपारमिता का अभ्यास करूँगा। (42). हे भगवन्! भविष्य में यदि कोई बोधिसत्त्व मार्ग का अनुसरण करना चाहे, तो मैं उसके लिए दानपारमिता का अभ्यास करूँगा, ताकि यह परम्परा कभी समाप्त न हो।
1.1.3. शीलपारमिता (शील) के अभ्यास का प्रणिधान (43). जब मैं पहली बार शीलपारमिता में प्रवेश करूँगा, तो अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि के लिए, विभिन्न प्रकार के शील धारण करूँगा। (44). (अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि के लिए) विभिन्न तपस्याओं का अभ्यास करूँगा। (45). जैसा कि दान के प्रसंग में कहा गया है, (मेरी कामना है कि) मेरे अनात्म भाव के अवलोकन के कारण, पाँचों इन्द्रियाँ पाँचों विषयों से आहत न हों।
1.1.4. क्षान्तिपारमिता (धैर्य) के अभ्यास का प्रणिधान (46). इस क्षान्तिपारमिता का, मैं इस प्रकार क्षान्तिपारमिता का अभ्यास करूँगा जैसा कि ऊपर कहा गया है (संस्कृत धर्मों का अवलोकन करके, सभी दोषों से मुक्त होकर, असंस्कृत धर्मों के सूक्ष्म, शांत स्वरूप को देखकर)।
1.1.5. वीर्यपारमिता (उत्साह) के अभ्यास का प्रणिधान (47). (जब मैं वीर्यपारमिता का अभ्यास करूँगा) तो परिश्रमपूर्वक अभ्यास करूँगा। (48). (जब मैं वीर्यपारमिता का अभ्यास करूँगा) तो अनुत्तर मार्ग से पीछे नहीं हटूँगा। (49). इस वीर्यपारमिता का, मैं भी इसी प्रकार वीर्यपारमिता का अभ्यास करूँगा।
1.1.6. ध्यानपारमिता (ध्यान) के अभ्यास का प्रणिधान (50). यदि सभी स्थानों पर शून्यता के स्वरूप का अभ्यास करके शांतिपूर्ण धर्म प्राप्त किया जाए, तो इसे ध्यानपारमिता कहते हैं (मैं इसी प्रकार ध्यानपारमिता का अभ्यास करने की कामना करता हूँ)।
1.1.7. प्रज्ञापारमिता (ज्ञान) के अभ्यास का प्रणिधान (51). यदि सभी धर्मों को मूलतः अनुत्पन्न और वर्तमान में अनिरुद्ध समझा जाए, तो इसे प्रज्ञापारमिता कहते हैं (मैं इसी प्रकार प्रज्ञापारमिता का अभ्यास करने की कामना करता हूँ)। (52). मैं असंख्य सौ हजार करोड़ असंख्य कल्पों तक, दृढ़तापूर्वक, परिश्रमपूर्वक प्रज्ञापारमिता का अभ्यास करूँगा। (53). (क्यों?...) इसलिए मैं अब भविष्य में अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न करूँगा। (54). (मैं अब भविष्य में) बोधिसत्त्व मार्ग का अभ्यास करूँगा। (55). (मैं अब भविष्य में बोधिसत्त्व मार्ग का अभ्यास करूँगा) ताकि सभी कुशल धर्म कभी समाप्त न हों।
1.2. प्राणियों के लिए दुःख सहने तथा विविध उपायों से उन्हें शिक्षित करने का प्रणिधान
1.2.1. चित्तोत्पाद एवं फल की अपेक्षा न करना (56). मैंने चित्तोत्पाद के बाद, भविष्य के सभी बोधिसत्त्वों के लिए, महाकरुणा का प्रदर्शन किया है, निर्वाण तक। (57). (मेरी कामना है कि जो मेरे महाकरुणा के नाम को सुनें, वे आश्चर्यचकित हों और अभूतपूर्व कहकर प्रशंसा करें।) (58). इसलिए मैं दान के विषय में अपनी प्रशंसा नहीं करता। (59). (मैं) शील पर निर्भर नहीं रहता। (60). (मैं) क्षान्ति का स्मरण नहीं करता। (61). (मैं) वीर्य पर आश्रित नहीं रहता। (62). (मैं) विभिन्न ध्यानों का आस्वादन नहीं करता। (63). मेरे पास जो भी प्रज्ञा है, वह तीनों कालों में आसक्त नहीं है। (64). यद्यपि इस प्रकार षट्पारमिताओं का अभ्यास करता हूँ, तथापि फल की कामना नहीं करता।
1.2.2. विशिष्ट दुष्कर्म करने वाले प्राणियों के लिए षट् पारमिताओं का अभ्यास एवं उनके स्थान पर दुःख भोगना (65). कुछ प्राणी ऐसे हैं जो आर्यों के सात धनों से रहित हैं, जिन्हें सभी बुद्धक्षेत्रों ने त्याग दिया है, जो पंचानन्तर्य पाप करते हैं, सद्धर्म का विनाश करते हैं, आर्यजनों की निंदा करते हैं, मिथ्या दृष्टि रखते हैं, जिनके भारी पाप पर्वत के समान हैं, जो सदा मिथ्या मार्ग से ढके रहते हैं; इसलिए मैं अब इन प्राणियों के लिए एकाग्रचित्त होकर, परिश्रमपूर्वक षट्पारमिताओं का अभ्यास करूँगा। (66). मैं प्रत्येक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, दस कल्पों तक, अवीचि नरक में प्रवेश कर असीम दुःख भोगूँगा। (67). (प्रत्येक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, दस कल्पों तक, ) तिर्यग्योनि (में असीम दुःख भोगूँगा)। (68). (प्रत्येक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, दस कल्पों तक, ) प्रेतयोनि (में असीम दुःख भोगूँगा)। (69). (प्रत्येक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, दस कल्पों तक, ) दरिद्र, देव-असुर (में असीम दुःख भोगूँगा)। (70). (प्रत्येक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, दस कल्पों तक, ) नीच मनुष्यों में, इसी प्रकार (असीम दुःख भोगूँगा)। (71). यदि कोई प्राणी कुशल-मूल रहित हो, स्मृतिहीन एवं व्यथित हो, तो मैं उन सभी को ग्रहण कर उनका दमन करूँगा। (72). (यदि कोई प्राणी कुशल-मूल रहित हो, स्मृतिहीन एवं व्यथित हो, तो मैं उन सभी को ग्रहण कर उनका दमन करूँगा) ताकि वे कुशल-मूल रोपित कर सकें। (73). भद्रकल्प तक, इस बीच, मैं कभी भी स्वर्ग या मनुष्य लोक में सुख भोगने की कामना नहीं करूँगा, सिवाय एक जन्म के जब मैं तुषित स्वर्ग में रहकर बुद्ध बनने के समय की प्रतीक्षा करूँगा।
1.2.3. सभी बुद्धों की व्यापक पूजा तथा प्राणियों को शिक्षित करना (74). मुझे इस प्रकार लंबे समय तक जन्म-मरण में रहना चाहिए, जैसे एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों के बराबर कल्पों तक, सभी आवश्यक वस्तुओं से सभी बुद्धों की पूजा करनी चाहिए। (75). एक प्राणी में कुशल-मूल रोपित करने के लिए, एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर पूजा सामग्री से, दसों दिशाओं के असंख्य, अपरिमेय प्रत्येक बुद्ध की पूजा करनी चाहिए। (76). दसों दिशाओं के असंख्य, अपरिमेय प्रत्येक बुद्ध के समक्ष, एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर कुशल पुण्य प्राप्त करना चाहिए। (77). प्रत्येक बुद्ध के समक्ष, पुनः एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें अनुत्तर बोधि मार्ग पर स्थापित करना चाहिए। (78). (प्रत्येक बुद्ध के समक्ष, पुनः एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें) प्रत्येकबुद्ध (मार्ग पर स्थापित करना चाहिए)। (79). (प्रत्येक बुद्ध के समक्ष, पुनः एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें) श्रावक (मार्ग पर स्थापित करना चाहिए) इसी प्रकार, सभी प्राणियों की इच्छा के अनुसार शिक्षित करना चाहिए।
1.2.4. बुद्ध रहित युग तथा प्राणियों के अनुसार रूप धारण कर शिक्षित करना (80). यदि किसी लोक में बुद्ध का उद्भव न हुआ हो, तो मैं ऋषि बनकर, सभी प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें दस कुशल कर्मों में स्थापित करने की कामना करता हूँ। (81). (ऋषि बनकर, सभी प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें) पाँच अभिज्ञाओं में (स्थापित करने की कामना करता हूँ)। (82). (ऋषि बनकर, सभी प्राणियों को शिक्षित कर, उन्हें) सभी दृष्टियों से दूर (करने की कामना करता हूँ)। (83). यदि कोई प्राणी महेश्वर देव की पूजा करता हो, तो मैं महेश्वर का रूप धारण कर उसे शिक्षित करने की कामना करता हूँ, ताकि वह कुशल धर्मों में स्थापित हो सके। (84). जो अष्टभुजा देव की पूजा करता हो, तो मैं भी अष्टभुजा देव का रूप धारण कर उसे शिक्षित करने की कामना करता हूँ, ताकि वह कुशल धर्मों में स्थापित हो सके। (85). जो सूर्य-चंद्र (देव) की पूजा करता हो, तो मैं भी सूर्य-चंद्र (देव) का रूप धारण कर उसे शिक्षित करने की कामना करता हूँ, ताकि वह कुशल धर्मों में स्थापित हो सके। (86). जो ब्रह्मा देव की पूजा करता हो, तो मैं भी ब्रह्मा (देव) का रूप धारण कर उसे शिक्षित करने की कामना करता हूँ, ताकि वह कुशल धर्मों में स्थापित हो सके। (87). जो गरुड़ की पूजा करता हो, (तो मैं गरुड़ का रूप धारण कर उसके अनुसार शिक्षित कर, उसे कुशल धर्मों में स्थापित करने की कामना करता हूँ)। (88). (यहाँ तक कि) जो खरगोश की पूजा करता हो, तो मैं खरगोश का रूप धारण कर उसके अनुसार शिक्षित कर, उसे कुशल धर्मों में स्थापित करने की कामना करता हूँ।
1.2.5. प्राणियों की रक्षा के लिए शरीर का त्याग करना (89). यदि मैं भूखे प्राणियों को देखूँ, तो मैं अपने शरीर का रक्त-मांस उन्हें देकर उनकी तृप्ति करूँगा। (90). यदि कोई प्राणी अपराध करे, तो मैं अपने प्राण देकर उसके अपराध का प्रायश्चित करूँगा और उसकी रक्षा करूँगा।
1.3. भद्रकल्प के आरम्भ में क्रकुच्छन्द बुद्ध के समय विशिष्ट दुष्कर्म करने वाले प्राणियों को शिक्षित करने का प्रणिधान (91). हे भगवन्! भविष्य में कुछ प्राणी ऐसे होंगे, जो सभी कुशल-मूलों से रहित होंगे, जिनके कुशल चित्त जल चुके होंगे। उस समय, मैं उन प्राणियों के लिए परिश्रमपूर्वक बोधिसत्त्व मार्ग का अनुसरण करूँगा। (92). (उस समय, मैं उन प्राणियों के लिए) जन्म-मरण में रहकर अनेक दुःख भोगूँगा। (93). यहाँ तक कि एक गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के बीतने पर, दूसरे गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के उत्तरार्ध में प्रवेश करने पर, भद्रकल्प के आरम्भ में, जब अग्निमाला नामक मानव अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त कर क्रकुच्छन्द तथागत बनेंगे, तब मेरे द्वारा शिक्षित, सभी कुशल कर्मों से रहित, अकुशल कर्म करने वाले, जिनके कुशल चित्त जल चुके हैं, आर्यों के सात धनों से रहित, पंचानन्तर्य पाप करने वाले, सद्धर्म का विनाश करने वाले, आर्यजनों की निंदा करने वाले, मिथ्या दृष्टि रखने वाले, जिनके भारी पाप पर्वत के समान हैं, जो सदा मिथ्या मार्ग से ढके रहते हैं, जिन्हें बुद्धक्षेत्रों ने त्याग दिया है, उन्हें अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न करने में सक्षम करूँगा। (94). (इन प्राणियों को) दानपारमिता का अभ्यास करने में सक्षम करूँगा। (95). (इन प्राणियों को) यहाँ तक कि प्रज्ञापारमिता का अभ्यास करने में सक्षम करूँगा। (96). (इन प्राणियों को) अविवर्त्य भूमि पर स्थापित करूँगा। (97). (इन प्राणियों को) सभी को बुद्ध बनने में सक्षम करूँगा। (98). (इन प्राणियों को सभी को बुद्ध बनने के बाद) दसों दिशाओं में एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर बुद्धक्षेत्रों में धर्मचक्र प्रवर्तन करने में सक्षम करूँगा। (99). (इन प्राणियों को) सभी प्राणियों को अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि में कुशल-मूल रोपित करने में सक्षम करूँगा। (100). (सभी प्राणियों को) बुरी गतियों से मुक्त करने में सक्षम करूँगा। (101). (सभी प्राणियों को) स्थापित एवं स्थिर करने में सक्षम करूँगा। (102). (सभी प्राणियों को) पुण्य, प्रज्ञा एवं बोधि में सहायक धर्मों में स्थापित करने में सक्षम करूँगा, मेरी कामना है कि उस समय मैं उन सभी को देख सकूँ।
1.4. स्वयं द्वारा प्रेरित प्राणियों को बुद्धत्व प्राप्त करते देखने का प्रणिधान (103). हे भगवन्! यदि कोई बुद्ध जहाँ कहीं भी हों, प्राणियों को बुद्ध के पास भेजें, ताकि वे अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि का व्याकरण प्राप्त कर सकें, और धारणी प्राप्त कर सकें। (104). (ताकि वे) समाधि प्राप्त कर सकें। (105). (ताकि वे) क्षान्ति प्राप्त कर सकें। (106). (ताकि वे) क्रमशः बोधिसत्त्व भूमि पर आरोहण कर सकें। (107). (ताकि वे) विभिन्न अलंकृत लोकों को प्राप्त कर सकें। (108). (ताकि वे) सभी अपनी इच्छानुसार शुद्ध बुद्धक्षेत्र प्राप्त कर सकें। (109). ऐसे सभी प्राणी मेरे द्वारा प्रेरित किए गए होंगे। भद्रकल्प में, जब क्रकुच्छन्द बुद्ध का उद्भव होगा, तब ऐसे सभी प्राणी भी दसों दिशाओं में धूलिकणों की संख्या के बराबर बुद्धक्षेत्रों में अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करेंगे, और जहाँ कहीं भी रहकर धर्मोपदेश देंगे, उसे भी मैं देख सकूँ।
1.5. भद्रकल्प में बुद्धों के उद्भव के समय आचरण एवं प्रणिधान
1.5.1. क्रकुच्छन्द बुद्ध के समय (110). हे भगवन्! जब क्रकुच्छन्द बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करेंगे, तब मैं उनके पास जाकर, विभिन्न पूजा सामग्रियों से उनकी पूजा करूँगा। (111). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के पास) प्रव्रज्या की विधि के विषय में विभिन्न प्रश्न पूछूँगा। (112). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के धर्म में) निर्मल शील धारण करूँगा। (113). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के धर्म में) व्यापक रूप से श्रुत एवं बहुश्रुत बनूँगा। (114). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के धर्म में) एकाग्रचित्त होकर समाधि का अभ्यास करूँगा। (115). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के धर्म में) परिश्रमपूर्वक वीर्य का अभ्यास करूँगा। (116). (क्रकुच्छन्द बुद्ध के धर्म में) सूक्ष्म धर्म का उपदेश दूँगा, तथागत के अतिरिक्त कोई भी मुझसे श्रेष्ठ नहीं होगा। (117). उस समय, यदि कोई मन्दबुद्धि प्राणी कुशल-मूल रहित हो, मिथ्या दृष्टि में पड़ा हो, मिथ्या मार्ग पर चलता हो, पंचानन्तर्य पाप करता हो, सद्धर्म का विनाश करता हो, आर्यजनों की निंदा करता हो, जिसके भारी पाप पर्वत के समान हों, तो मैं उस समय ऐसे प्राणियों के लिए सद्धर्म का उपदेश देकर उनका संग्रह एवं दमन करूँगा। (118). बुद्ध (क्रकुच्छन्द बुद्ध) के अस्त होने के बाद, मैं उनके बाद, स्वतः ही असंख्य बुद्धकार्य करूँगा।
1.5.2. कनकमुनि बुद्ध, काश्यप बुद्ध आदि के समय (119). कनकमुनि (बुद्ध संसार में रहकर धर्मोपदेश देंगे, मैं भी इसी प्रकार पूजा, अभ्यास, प्राणियों का दमन करूँगा) यहाँ तक कि स्वतः ही बुद्धकार्य करूँगा, इसी प्रकार। (120). काश्यप बुद्ध आदि संसार में रहकर धर्मोपदेश देंगे, (मैं भी इसी प्रकार पूजा, अभ्यास, प्राणियों का दमन करूँगा) यहाँ तक कि स्वतः ही बुद्धकार्य करूँगा, इसी प्रकार।
1.5.3. जब मनुष्यों की आयु एक हजार वर्ष हो (121). जब मनुष्यों की आयु एक हजार वर्ष होगी, तब मैं सभी प्राणियों को तीन पुण्य क्षेत्रों में (अभ्यास करने के लिए) प्रेरित करूँगा। (122). एक हजार वर्ष बीतने के बाद, स्वर्ग में उत्पन्न होकर, सभी देवों एवं मनुष्यों को सद्धर्म का उपदेश दूँगा, ताकि वे दमित हो सकें।
1.6. एक सौ बीस वर्ष की आयु वाले पंचकषाय युक्त दुष्ट युग में बुद्धत्व प्राप्ति से पूर्व गर्भ में प्रवेश तथा गर्भ में आचरण का प्रणिधान
1.6.1. जन्म का कारण एवं स्थान (123). जब मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष होगी, (विभिन्न दुष्कर्म करने वाले प्राणियों से युक्त पंचकषाय युक्त दुष्ट युग का सामना करते हुए), हे भगवन्! मेरी कामना है कि उस समय मैं तुषित स्वर्ग से नीचे आऊँ। (124). (मेरी कामना है कि उस समय मैं) सर्वश्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा के कुल में जन्म लूँ। (125). (मेरी कामना है कि उस समय मैं) यदि (जन्म लूँ तो) स्वतंत्र राजा के कुल में। (126). (मेरी कामना है कि उस समय मैं) प्रथम महारानी के गर्भ में रहूँ। (127). (मेरी कामना है कि उस समय मैं गर्भ में रहूँ, यह) सभी प्राणियों के चित्तों का दमन करने, उनके कुशल-मूलों का अभ्यास करने के लिए हो।
1.6.2. गर्भ में प्रवेश के समय प्रकाश का सर्वत्र फैलना तथा प्राणियों का हित करना (128). गर्भ में प्रवेश करते ही, मैं महान प्रकाश उत्सर्जित करूँगा, वह सूक्ष्म प्रकाश सहालोकधातु में सर्वत्र फैलेगा, वज्रमय सीमा से लेकर अकनिष्ठ स्वर्ग तक। (129). ताकि वहाँ के सभी प्राणी, यदि नरक में हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (130). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि तिर्यग्योनि में हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (131). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि प्रेतयोनि में हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (132). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि स्वर्ग में हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (133). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि मनुष्य लोक में हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (134). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि रूपवान हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (135). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि अरूपवान हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (136). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि संज्ञावान हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (137). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि असंज्ञावान हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (138). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि नैवसंज्ञावान हों (तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें)। (139). (ताकि वहाँ के सभी प्राणी) यदि नैवासंज्ञावान हों, तो सभी मेरे सूक्ष्म प्रकाश को देखने की कामना करें। (140). यदि प्रकाश शरीर को स्पर्श करे, तो वे उसे जानने की भी कामना करें। (141). प्रकाश को देखने और जानने के कारण, वे सभी जन्म-मरण के दोषों को समझ सकें। (142). (प्रकाश को देखने और जानने के कारण, वे सभी) अनुत्तर, शांत निर्वाण की प्राप्ति के लिए परिश्रम करें। (143). (प्रकाश को देखने और जानने के कारण) यहाँ तक कि एक क्षण में सभी क्लेशों का नाश कर सकें, इसे ही सभी प्राणियों में निर्वाण के मूल का प्रथम रोपण कहा जाता है।
1.6.3. गर्भ में साधना तथा प्राणियों का हित करना (144). मेरी कामना है कि मैं दस महीने गर्भ में रहकर, सभी धर्मों का चयन करने, सभी धर्म द्वारों में प्रवेश करने में सक्षम हो सकूँ, जिसे अनुत्पन्न शून्यता समाधि द्वार कहते हैं। (145). (मेरी कामना है कि मैं) भविष्य के असंख्य कल्पों में इस समाधि का उपदेश दूँ, और यह सुदृढ़ चित्त कभी समाप्त न हो। (146). यदि मैं गर्भ से निकलकर अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करूँ, तो उन (प्रकाश एवं गर्भ शिक्षा से कुशल-मूल रोपित करने वाले) सभी प्राणियों को मैं जन्म-मरण से मुक्त करूँगा। (147). ऐसे सभी प्राणियों को मुझे देखने में सक्षम करूँगा। (148). यद्यपि मैं दस महीने माता के गर्भ में रहूँगा, तथापि वास्तव में मैं रत्नोच्चय समाधि में स्थित रहूँगा। (149). (यद्यपि मैं दस महीने माता के गर्भ में रहूँगा, तथापि वास्तव में मैं) पद्मासन में बैठा रहूँगा। (150). (यद्यपि मैं दस महीने माता के गर्भ में रहूँगा, तथापि वास्तव में मैं) सम्यक् समाधि में ध्यानमग्न रहूँगा।
1.7. जन्म तथा बालक, राजकुमार, प्रव्रज्या के प्रदर्शन का प्रणिधान
1.7.1. गर्भ से निकलकर प्राणियों का हित करने का प्रदर्शन (151). दस महीने पूरे होने पर मैं दाहिनी बगल से निकलूंगा। (152). सभी पुण्यों से सम्पन्न समाधि-शक्ति के कारण, मैं सहालोकधातु को, वज्रमय सीमा से लेकर अकनिष्ठ स्वर्ग तक, छह प्रकार से कम्पित करूँगा। (153). वहाँ के प्राणी, चाहे नरक, तिर्यग्योनि, प्रेतयोनि, स्वर्ग या मनुष्य लोक में हों, सभी जागृत हो जाएँगे। (154). उस समय, पुनः सूक्ष्म प्रकाश से सहालोकधातु को सर्वत्र प्रकाशित करूँगा, और असंख्य प्राणियों को जागृत करूँगा। (155). यदि कोई प्राणी कुशल-मूल रहित हो, तो मैं उसे स्थापित कर कुशल-मूल रोपित करने में सक्षम करूँगा। (156). निर्वाण में कुशल-मूल रोपित करने के बाद, सभी प्राणियों में समाधि का अंकुर उत्पन्न करूँगा। (157). जब मैं दाहिनी बगल से निकलकर पृथ्वी पर पैर रखूँगा, तो पुनः सहालोकधातु को, वज्रमय सीमा से लेकर अकनिष्ठ स्वर्ग तक, छह प्रकार से कम्पित करने की कामना करता हूँ। (158). सभी प्राणी जो जल पर आश्रित हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (159). (सभी प्राणी जो) पृथ्वी पर आश्रित हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (160). (सभी प्राणी जो) आकाश पर आश्रित हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (161). (सभी प्राणी जो) जरायुज हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (162). (सभी प्राणी जो) अंडज हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (163). (सभी प्राणी जो) संस्वेदज हैं (पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ)। (164). (सभी प्राणी जो) औपपादुकीय हैं, पाँच गतियों में, सभी जागृत हो जाएँ। (165). यदि कोई प्राणी समाधि प्राप्त न कर सका हो, तो मेरी कामना है कि वे सभी इसे प्राप्त करें। (166). समाधि प्राप्त करने के बाद, उन्हें तीन यानों के धर्म में अविवर्त्य भूमि पर स्थापित करूँगा। (167). मेरे जन्म के बाद, सहालोकधातु के सभी देव, ब्रह्मा, मार, त्रायस्त्रिंश देव, सूर्य-चंद्र देव, चतुर्महाराजिक देव, सभी महान नागराज, गंधर्व, असुर, गरुड़, किन्नर, महोरग, औपपादुकीय ऋषि, यक्ष, राक्षस, सभी मेरे पास आकर मेरी पूजा करें। (168). मेरे जन्म के बाद, मैं शीघ्र ही सात कदम चलूँ। (169). सात कदम चलने के बाद, विवेकपूर्ण पुण्य समाधि-शक्ति के कारण, मैं सद्धर्म का उपदेश दूँ। (170). (सद्धर्म का उपदेश दूँ) ताकि सभी उपस्थित जनसमूह प्रसन्न हों। (171). (सद्धर्म का उपदेश दूँ, ताकि सभी उपस्थित जनसमूह) तीन यानों में स्थित हों। (172). इस जनसमूह में, यदि कोई प्राणी श्रावकयान का अभ्यास करता हो, तो मेरी कामना है कि वह इसी जीवन में दमित हो जाए। (173). यदि कोई प्रत्येकबुद्धयान का अभ्यास करता हो, तो वे सभी सूर्यप्रभा क्षान्ति प्राप्त करें। (174). जो महायान का अभ्यास करते हों, वे सभी वज्रप्रेम संरक्षण महासागर समाधि धारण करें। (175). (जो महायान का अभ्यास करते हों) समाधि-शक्ति के कारण, तीन भूमियों को पार करें। (176). उस समय मैं स्नान करने की इच्छा करूँगा, मेरी कामना है कि सर्वश्रेष्ठ नागराज आकर मेरे शरीर का अभिषेक करें। (177). (जब नागराज मेरे शरीर का अभिषेक करें) तो जो प्राणी देखें, वे तीन यानों में स्थित हों, और प्राप्त पुण्य ऊपर बताए अनुसार हों।
1.7.2. बालक, राजकुमार, प्रव्रज्या का प्रदर्शन (178). जब मैं बालक के रूप में भेड़गाड़ी पर सवार होऊँ, तो जो विभिन्न कलाएँ प्रदर्शित करूँ, वे सभी प्राणियों को जागृत करने के लिए हों। (179). राजमहल, पत्नियों, दासियों, पंचकामगुणों के बीच रहकर मनोरंजन करते हुए, (कामना करता हूँ कि) उनके दोषों को देख सकूँ। (180). (कामना करता हूँ कि) आधी रात को नगर से निकल सकूँ। (181). (कामना करता हूँ कि आधी रात को नगर से निकलते समय) सभी मालाएँ और शरीर के आभूषण त्याग सकूँ। (182). (कामना करता हूँ कि आधी रात को नगर से निकलते समय, ) निर्ग्रंथ आदि अन्य मतों के आचार्यों का खंडन कर सकूँ। (183). (कामना करता हूँ कि) वस्त्रों के प्रति सम्मान के कारण, मैं काषाय वस्त्र धारण कर बोधिवृक्ष के नीचे जाऊँ।
1.8. बोधिवृक्ष के नीचे साधना, बुद्धत्व प्राप्ति तथा प्राणियों के उद्धार का प्रणिधान
1.8.1. बोधिवृक्ष के नीचे प्राणियों द्वारा प्रणिधान तथा लाभ प्राप्ति (184). प्राणी मुझे बोधिवृक्ष के नीचे देखकर, सभी यह प्रणिधान करें कि मैं शीघ्र ही सभी पुण्यों से सम्पन्न समाधि-शक्ति से तीन यानों के धर्म का उपदेश दूँ। (185). (प्राणी) यह धर्म सुनकर, तीन यानों में, गहरी इच्छा उत्पन्न करें। (186). (प्राणी यह धर्म सुनकर, तीन यानों में) परिश्रमपूर्वक वीर्य का अभ्यास करें। (187). यदि कोई श्रावकयान में प्रवृत्त हो चुका हो, तो उसे क्लेशों से मुक्त करूँ। (188). (यदि कोई श्रावकयान में प्रवृत्त हो चुका हो) तो वह निश्चय ही एक जन्म में मेरे पास आकर दमित हो। (189). यदि कोई प्रत्येकबुद्धयान में प्रवृत्त हो चुका हो, तो वे सभी सूर्यप्रभा क्षान्ति प्राप्त करें। (190). यदि कोई महायान में प्रवृत्त हो चुका हो, तो वे सभी वज्रप्रेम संरक्षण महासागर समाधि धारण करें। (191). (यदि कोई महायान में प्रवृत्त हो चुका हो) समाधि-शक्ति के कारण, तीन भूमियों को पार करें।
1.8.2. तपस्या का प्रदर्शन तथा प्राणियों को देखने-सुनने से लाभ (192). मैं स्वयं कुश घास लेकर बोधिवृक्ष के नीचे, वज्रासन पर बैठूँगा। (193). (मैं स्वयं कुश घास लेकर बोधिवृक्ष के नीचे) पद्मासन में बैठूँगा। (194). (मैं स्वयं कुश घास लेकर बोधिवृक्ष के नीचे) शरीर और मन को सीधा रखूँगा। (195). (मैं स्वयं कुश घास लेकर बोधिवृक्ष के नीचे) अपनी स्मृति को अप्रज्ञा समाधि में स्थित करूँगा। (196). समाधि-शक्ति के कारण, श्वास-प्रश्वास को रोककर शांत करूँगा। (197). इस समाधि में, एक दिन और एक रात, आधा तिल और आधा चावल खाऊँगा। (198). शेष आधा, दूसरों को दान करूँगा। (199). मैं इस प्रकार लंबे समय तक तपस्या का अभ्यास करूँगा, सहालोकधातु से लेकर अकनिष्ठ स्वर्ग तक, जो मेरा नाम सुनेंगे, वे सभी मेरे पास आकर मेरी पूजा करेंगे। (200). मैं इस प्रकार तपस्या करूँगा, ऐसे सभी प्राणी मेरे लिए साक्षी बनेंगे। (201). यदि कोई प्राणी श्रावकयान में कुशल-मूल रोपित कर चुका हो, हे भगवन्! मेरी कामना है कि उनके सभी क्लेशों से युक्त चित्त शांत हो जाएँ। (202). (यदि कोई प्राणी श्रावकयान में कुशल-मूल रोपित कर चुका हो) यदि उसका एक और जन्म शेष हो, तो वह निश्चय ही मेरे पास आकर दमित होगा। (203). प्रत्येकबुद्ध (यान में कुशल-मूल रोपित करने वाले, उन्हें भी इसी प्रकार लाभ प्राप्त हो)। (204). महायान (में कुशल-मूल रोपित करने वाले), उन्हें भी इसी प्रकार (लाभ प्राप्त हो)। (205). यदि कोई नाग, देव-असुर, गंधर्व, असुर, गरुड़, किन्नर, महोरग, प्रेत, पिशाच, पंच अभिज्ञा वाले ऋषि, मेरे पास आकर मेरी पूजा करें। (206). मैं इस प्रकार तपस्या करूँगा, ये सभी प्राणी साक्षी बनेंगे। (207). यदि कोई श्रावकयान का अभ्यास कर चुका हो (और मेरे पास आकर मेरी पूजा करे, मेरी तपस्या का साक्षी बने, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (208). (यदि कोई) प्रत्येकबुद्ध (यान का अभ्यास कर चुका हो और मेरे पास आकर मेरी पूजा करे, मेरी तपस्या का साक्षी बने, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (209). (यदि कोई) तथा महायान (का अभ्यास कर चुका हो और मेरे पास आकर मेरी पूजा करे, मेरी तपस्या का साक्षी बने, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (210). यदि चतुर्द्वीप के प्राणी, जो अन्य मतों का अनुसरण करते हैं, रूखा भोजन करते हैं और तपस्या करते हैं, (अमानुषों द्वारा मेरी तपस्या की प्रशंसा सुनकर), मेरी कामना है कि ये सभी लोग अपने अभ्यास को त्याग दें। (211). (मेरी कामना है कि ये सभी लोग) सभी मेरे पास आकर मेरी तपस्या देखें। (212). यदि कोई (श्रावकयान का अभ्यास कर चुका हो और आकर मेरी तपस्या देखे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (213). यहाँ तक कि महायान (का अभ्यास करने वाले जो आकर मेरी तपस्या देखें, उन्हें भी लाभ प्राप्त हो)। (214). यदि कोई राजा, मंत्री, प्रजा, गृहस्थ, प्रव्रजित, सभी मुझे इस तपस्या का अभ्यास करते हुए देखें, और मेरे पास आकर मेरी पूजा करें। (215). यदि कोई (श्रावकयान का अभ्यास कर चुका हो और मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (216). (यदि कोई प्रत्येकबुद्धयान का अभ्यास कर चुका हो और मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (217). (यदि कोई महायान का अभ्यास कर चुका हो और मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (218). यदि कोई स्त्री मुझे तपस्या करते हुए देखे, और मेरे पास आकर मेरी पूजा करे, तो उन स्त्रियों का वह शरीर ही उनका अंतिम शरीर हो। (219). यदि कोई (श्रावकयान का अभ्यास करने वाली स्त्री मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (220). (यदि कोई प्रत्येकबुद्धयान का अभ्यास करने वाली स्त्री मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (221). (यदि कोई महायान का अभ्यास करने वाली स्त्री मुझे तपस्या करते देखकर आकर पूजा करे, तो उसे भी लाभ प्राप्त हो)। (222). यदि कोई पशु-पक्षी मुझे तपस्या करते हुए देखें, और मेरे पास आएँ, तो वे सभी पशु-पक्षी उस जीवन के अंत में पुनः पशु-पक्षी का शरीर धारण न करें। (223). यदि कोई (श्रावकयान में प्रवृत्त पशु-पक्षी मेरे पास आएँ), तो उनका एक और जन्म शेष रहने पर वे निश्चय ही मेरे पास आकर दमित हों। (224). यदि कोई (प्रत्येकबुद्ध चित्त वाले पशु-पक्षी मेरे पास आएँ), तो उनके साथ भी ऐसा ही हो। (225). यहाँ तक कि सूक्ष्म कीट (जो मुझे तपस्या करते हुए देखें, वे भी इसी प्रकार उद्धार प्राप्त करें)। (226). (यहाँ तक कि) प्रेत (जो मुझे तपस्या करते हुए देखें), उनके साथ भी ऐसा ही (उद्धार प्राप्त हो)। (227). मैं इस प्रकार लंबे समय तक तपस्या करूँ, एक बार पद्मासन में बैठने पर, सौ हजार करोड़ नयुत असंख्य प्राणी मेरे लिए साक्षी बनें। (228). (कामना करता हूँ कि) ऐसे सभी प्राणी असंख्य, अपरिमेय कल्पों से मुक्ति का बीज बो चुके हों। (229). हे भगवन्! मैं इस प्रकार तपस्या करूँगा, (कामना करता हूँ कि) अतीत के प्राणी कभी भी ऐसी तपस्या न कर सके हों, और अन्य मतों के अनुयायी, श्रावक, प्रत्येकबुद्ध, महायान के अनुयायी भी ऐसी तपस्या न कर सके हों। (230). हे भगवन्! मैं इस प्रकार तपस्या करूँगा, (कामना करता हूँ कि) भविष्य के प्राणी भी ऐसी तपस्या न कर सकें, और अन्य मतों के अनुयायी, श्रावक, प्रत्येकबुद्ध, महायान के अनुयायी भी ऐसी तपस्या न कर सकें।
1.8.3. मार पर विजय, बुद्धत्व प्राप्ति तथा प्राणियों का उद्धार (231). अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने से पहले ही, मैं महान कार्य कर सकूँ, अर्थात् मार राजा और उसके अनुयायियों का विनाश कर सकूँ। (232). मैं क्लेश मार का विनाश करने की कामना करता हूँ। (233). (मैं कामना करता हूँ कि) अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, एक प्राणी को अर्हत् के श्रेष्ठ फल में स्थापित करने के लिए, उतने समय तक, अवशिष्ट कर्मफल भोगने के लिए शरीर धारण करूँ। (234). इसी प्रकार दूसरे प्राणी को अर्हत् (के श्रेष्ठ फल में स्थापित करने के लिए, उतने समय तक, अवशिष्ट कर्मफल भोगने के लिए शरीर धारण करूँ)। (235). (इसी प्रकार) तीसरे (प्राणी को अर्हत् के श्रेष्ठ फल में स्थापित करने के लिए, उतने समय तक, अवशिष्ट कर्मफल भोगने के लिए शरीर धारण करूँ)। (236). (इसी प्रकार) चौथे के साथ भी ऐसा ही हो। (237). मैं प्रत्येक प्राणी के लिए, सौ हजार असंख्य ऋद्धि-प्रदर्शन करूँ, ताकि उन्हें सम्यक् दृष्टि में स्थापित कर सकूँ। (238). प्रत्येक प्राणी के लिए, सौ हजार असंख्य धर्म द्वारों के अर्थ का उपदेश दूँ, उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें आर्य फल में स्थापित कर सकूँ। (239). वज्रमय प्रज्ञा से, सभी प्राणियों के क्लेश पर्वतों का विनाश करूँ। (240). सभी प्राणियों के लिए तीन यानों के धर्म का उपदेश दूँ। (241). प्रत्येक प्राणी के लिए, सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना, उनके पास जाकर धर्मोपदेश दूँ। (242). (प्रत्येक प्राणी के लिए, सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना, उनके पास जाकर धर्मोपदेश दूँ) ताकि उन्हें अभय में स्थापित कर सकूँ। (243). यदि कोई मेरे धर्म में प्रव्रजित होना चाहे, तो मेरी कामना है कि कोई बाधा न हो (जैसे दुर्बलता, स्मृतिहीनता, विक्षिप्तता, अभिमान, भयहीनता, मूर्खता, प्रज्ञाहीनता, अनेक क्लेशों से युक्त चित्त की चंचलता आदि बाधाएँ)। (244). यदि कोई स्त्री मेरे धर्म में प्रव्रजित होकर महाशील ग्रहण करना चाहे, (तो मेरी कामना है कि) वह महाप्रणिधानों को सिद्ध करे। (245). मेरे सभी चार प्रकार के अनुयायी, भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका, सभी पूजा प्राप्त करें। (246). मेरी कामना है कि सभी देव, मनुष्य और सभी देव-असुर चतुर् आर्य सत्य प्राप्त करें। (247). (मेरी कामना है कि) सभी नाग (अष्टांग शील धारण करें, शुद्ध ब्रह्मचर्य का अभ्यास करें)। (248). (मेरी कामना है कि) असुर (अष्टांग शील धारण करें, शुद्ध ब्रह्मचर्य का अभ्यास करें)। (249). (मेरी कामना है कि) तथा अन्य पशु, अष्टांग शील धारण करें। (250). (मेरी कामना है कि सभी नाग, असुर तथा अन्य पशु) शुद्ध ब्रह्मचर्य का अभ्यास करें।
1.9. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद शत्रुओं को शिक्षित करना, निर्मित बुद्धों द्वारा प्राणियों का उद्धार तथा मृत्यु के समय उद्धार का प्रणिधान
1.9.1. शत्रुओं का रूपांतरण, बुरे कर्म संबंधों का समाधान (251). अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, यदि कोई प्राणी मेरे प्रति क्रोध करे, या तलवार, लाठी, अग्नि-कुंड या अन्य विभिन्न तरीकों से मुझे क्षति पहुँचाना चाहे, या बुरे शब्दों से मेरी निंदा करे, दसों दिशाओं में मेरी अवहेलना करे, या विषयुक्त भोजन मुझे खिलाए; ऐसे अवशिष्ट कर्मों को मैं सब सहन करूँगा। (252). (उन) अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि (प्राप्त करने के बाद), पूर्वजन्म के सभी शत्रु प्राणियों के प्रति, जो द्वेषपूर्ण चित्त रखते हैं, विभिन्न बुरे शब्द कहते हैं, मिश्रित विषयुक्त भोजन देते हैं, मेरे शरीर से रक्त बहाते हैं, ऐसे लोग, सभी द्वेषपूर्ण चित्त से मेरे पास आएँ; मैं शील, बहुश्रुतता, समाधि, महाकरुणा से युक्त चित्त, ब्रह्मस्वर एवं मधुर ध्वनि से उनके लिए धर्मोपदेश दूँगा। (253). ताकि वे (शत्रु) सुनकर चित्त को शुद्ध कर सकें। (254). (ताकि वे शत्रु सुनकर) कुशल धर्मों में स्थित हो सकें। (255). (ताकि वे शत्रु) जो दुष्कर्म किए हैं, शीघ्र ही उनका पश्चाताप कर सकें। (256). (ताकि वे शत्रु जो दुष्कर्म किए हैं) पुनः कभी न करें। (257). सभी (शत्रुओं) को स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेने में सक्षम करूँ, कोई बाधा न हो। (258). (ताकि वे शत्रु) स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेकर, अद्भुत मुक्ति प्राप्त कर सकें। (259). (ताकि वे शत्रु स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेकर) श्रेष्ठ फल में स्थित हो सकें। (260). (ताकि वे शत्रु स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेकर) सभी कामेच्छाओं एवं बुराइयों से मुक्त हो सकें। (261). (ताकि वे शत्रु स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेकर) सभी प्रवाहों को सदा के लिए काट सकें। (262). (ताकि वे शत्रु स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में जन्म लेकर) बाधाकारी कर्म समाप्त हो जाएँ। (263). यदि किसी प्राणी के अवशिष्ट कर्म हों, तो वे सभी समाप्त हो जाएँ, कोई शेष न रहे।
1.9.2. रोमकूपों से निर्मित बुद्धों द्वारा प्राणियों का उद्धार (264). अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, मेरे शरीर के सभी रोमकूपों से, प्रतिदिन निर्मित बुद्ध निकलें, जो बत्तीस लक्षणों से युक्त हों, अस्सी अनुव्यंजनों से सुशोभित हों। (265). मैं (निर्मित बुद्धों को) बुद्ध रहित लोकों में भेजूँगा। (266). (मैं निर्मित बुद्धों को) बुद्ध युक्त लोकों में भेजूँगा। (267). (मैं निर्मित बुद्धों को) तथा पंचकषाय युक्त लोकों में भेजूँगा। (268). यदि उस लोक में पंचानन्तर्य कर्म करने वाले, सद्धर्म का विनाश करने वाले, आर्यजनों की निंदा करने वाले, यहाँ तक कि सभी कुशल-मूलों को नष्ट करने वाले, श्रावक, प्रत्येकबुद्ध, महायान का अभ्यास करने वाले, सभी शीलों को तोड़ने वाले, महापाप में पड़े, कुशल चित्त को जलाने वाले, कुशल मार्ग को नष्ट करने वाले, जन्म-मरण के सूने रेगिस्तान में पड़े, मिथ्या मार्ग पर चलने वाले, पाप के पर्वत पर चढ़ने वाले प्राणी हों। ऐसे सौ हजार करोड़ प्राणी, प्रत्येक निर्मित बुद्ध एक ही दिन में सर्वत्र उनके लिए धर्मोपदेश दें। (269). (निर्मित बुद्ध) यदि कोई महेश्वर की पूजा करता हो, तो उसका रूप धारण कर उसके लिए धर्मोपदेश दें। (270). (निर्मित बुद्ध) उस समय मेरे नाम का उच्चारण कर मेरी प्रशंसा भी करें। (271). मेरी कामना है कि ये प्राणी मेरी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न हों। (272). (मेरी कामना है कि ये प्राणी मेरी प्रशंसा सुनकर) कुशल-मूल रोपित करें। (273). (मेरी कामना है कि ये प्राणी मेरी प्रशंसा सुनकर) मेरे लोक में जन्म लें।
1.9.3. मृत्यु के समय उद्धार न कर पाने पर बुद्ध न बनने की प्रतिज्ञा (274). हे भगवन्! यदि ये प्राणी मृत्यु के समय, मैं उनके समक्ष उपस्थित होकर धर्मोपदेश न दूँ जिससे उनका चित्त शुद्ध हो, तो मैं भविष्य में कभी भी अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त नहीं करूँगा। (275). यदि वे प्राणी मृत्यु के बाद तीन बुरी गतियों में पड़ें, और मेरे लोक में मनुष्य शरीर धारण न करें, तो मेरे द्वारा ज्ञात असंख्य सद्धर्म सभी नष्ट हो जाएँगे। (276). (यदि वे प्राणी मृत्यु के बाद तीन बुरी गतियों में पड़ें, और मेरे लोक में मनुष्य शरीर धारण न करें) तो सभी बुद्धकार्य सिद्ध नहीं होंगे। (277). जो नारायण की पूजा करते हैं, उनके साथ भी ऐसा ही हो (मृत्यु के समय धर्मोपदेश, बुरी गतियों में न पड़ना, मेरे लोक में जन्म लेना)।
1.9.4. अन्य लोकों के पापियों को अपने लोक में जन्म दिलाना तथा बुद्धकार्य का प्रदर्शन (278). हे भगवन्! अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, मेरी कामना है कि अन्य लोकों के सभी पंचानन्तर्य कर्म करने वाले, यहाँ तक कि मिथ्या मार्ग पर चलने वाले, पाप के पर्वत पर चढ़ने वाले प्राणी, मृत्यु के समय सभी मेरे लोक में आकर जन्म लें। (279). (मेरी कामना है कि वे) अपने मूल स्वरूप और शरीर के रंग के अनुसार (पीले-सफेद, कांतिहीन, कुरूप मुख वाले, पिशाच जैसे, स्मृतिहीन, शीलभ्रष्ट, दुर्गंधित, अल्पायु, इन सभी बुराइयों से शरीर क्षीण, जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक वस्तुएँ सदा अपर्याप्त, फिर भी पुनर्जन्म प्राप्त करें)। (280). इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में, तुषित स्वर्ग से नीचे आऊँ। (281). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) माता के गर्भ में स्थित होने का प्रदर्शन करूँ। (282). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) यहाँ तक कि बालक के रूप में, विभिन्न कलाएँ सीखूँ। (283). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) प्रव्रजित होकर तपस्या करूँ। (284). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) सभी मारों का विनाश करूँ। (285). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) अनुत्तर मार्ग प्राप्त करूँ। (286). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) धर्मचक्र प्रवर्तन करूँ। (287). (इन प्राणियों के लिए, सहालोकधातु के सभी चतुर्द्वीपों में, एक ही समय में) परिनिर्वाण के बाद शरीर-धातुओं का वितरण करूँ। (288). इस प्रकार विभिन्न बुद्धकार्यों का प्रदर्शन, सभी सौ करोड़ चतुर्द्वीपों में सर्वत्र व्याप्त हो।
1.10. एक ही ध्वनि से धर्मोपदेश देकर सभी प्रकार के प्राणियों को लाभ पहुँचाने का प्रणिधान (निम्नलिखित सभी प्रणिधान "अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, एक ही ध्वनि से धर्मोपदेश दूँगा" की शर्त पर आधारित हैं, ताकि धर्मश्रवण करने वाले प्राणियों को विभिन्न धर्मलाभ प्राप्त हों) (289). यदि कोई प्राणी श्रावकयान का अभ्यास करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह श्रावक धर्मकोष जान ले। (290). यदि कोई प्रत्येकबुद्धयान का अभ्यास करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रत्येकबुद्ध धर्म समझ ले। (291). यदि कोई अनुत्तर महायान का अभ्यास करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शुद्ध एवं अमिश्रित महायान धर्म समझ ले। (292). यदि कोई बोधि में सहायक धर्मों का अभ्यास कर बोधि प्राप्त करना चाहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धन का त्याग कर दे। (293). (यदि कोई बोधि में सहायक धर्मों का अभ्यास कर बोधि प्राप्त करना चाहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह) दान का अभ्यास करे। (294). यदि कोई प्राणी सभी पुण्यों से रहित हो, स्वर्ग एवं मनुष्य लोक के सुख की कामना करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शील धारण करे। (295). यदि कोई प्राणी एक-दूसरे से भयभीत हों, प्रेम एवं घृणा का भाव रखते हों, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे एक-दूसरे के प्रति स्नेह का भाव रखें। (296). यदि कोई प्राणी हत्या कर्म में प्रसन्न हों, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे करुणा का भाव रखें। (297). यदि कोई प्राणी सदा कृपणता एवं ईर्ष्या से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रसन्नता का अभ्यास करे। (298). यदि कोई प्राणी सुन्दर एवं निरोगी हो, रूप में आसक्त हो, चित्त में प्रमाद उत्पन्न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह उपेक्षा का भाव रखे। (299). यदि कोई प्राणी कामेच्छा से युक्त हो, चित्त में प्रमाद हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अशुद्धि का ध्यान करे। (300). यदि कोई महायान का अभ्यास करने वाला प्राणी औद्धत्य नीवरण से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह कायस्मृत्युपस्थान धर्म प्राप्त करे। (301). यदि कोई प्राणी सदा अपनी प्रशंसा करता हो, महान वाद-विवाद करने में सक्षम हो, जिसकी प्रज्ञा बिजली की तरह चमकती हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह गहन द्वादशांग प्रतीत्यसमुत्पाद समझ ले। (302). यदि कोई प्राणी अल्पश्रुत एवं अल्पज्ञ हो, स्वयं को वाद-विवाद में सक्षम कहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अचौर्य एवं अलोप धारणी प्राप्त करे। (303). यदि कोई प्राणी मिथ्या दृष्टि के पर्वत में प्रवेश कर चुका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों के गहन शून्यता द्वार को समझ ले। (304). यदि कोई प्राणी विभिन्न वितर्कों से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अलक्षण धर्म द्वार को गहराई से समझ ले। (305). यदि कोई प्राणी विभिन्न अशुद्ध प्रणिधानों से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अप्रणिहित धर्म द्वार को गहराई से समझ ले। (306). यदि कोई प्राणी अशुद्ध चित्त वाला हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, उसका चित्त शुद्ध हो जाए। (307). यदि कोई प्राणी अनेक विक्षेपों से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह बोधिचित्त धर्म को न खोने का उपाय समझ ले। (308). यदि कोई प्राणी क्रोध से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह यथार्थ स्वरूप समझ ले। (309). (यदि कोई प्राणी क्रोध से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर) वह व्याकरण प्राप्त करे। (310). यदि कोई प्राणी आश्रय से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों के निराश्रय स्वरूप को गहराई से समझ ले। (311). यदि कोई प्राणी आसक्ति से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शीघ्र ही सभी धर्मों के निर्मल, शुद्ध स्वरूप को समझ ले। (312). यदि कोई प्राणी कुशल चित्त भूल गया हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सूर्यप्रभा समाधि को गहराई से समझ ले। (313). यदि कोई प्राणी मार कर्म करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शीघ्र ही शुद्ध धर्म को समझ ले। (314). यदि कोई प्राणी मिथ्या वाद से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सद्धर्म की वृद्धि को गहराई से समझ ले। (315). यदि कोई प्राणी क्लेशों से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह क्लेश रहित धर्म को समझ ले। (316). यदि कोई प्राणी बुरी गतियों में चलता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह वापस लौट आए। (317). यदि कोई प्राणी महायान धर्म में मिथ्या धर्म की प्रशंसा करता हो, उसे शुभ एवं अद्भुत मानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह मिथ्या धर्म के प्रति विरक्ति का भाव रखे। (318). (यदि कोई प्राणी महायान धर्म में मिथ्या धर्म की प्रशंसा करता हो, उसे शुभ एवं अद्भुत मानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर) और सम्यक् ज्ञान प्राप्त करे। (319). यदि कोई बोधिसत्त्व जन्म-मरण से ऊब गया हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह जन्म-मरण के प्रति प्रेम का भाव रखे। (320). यदि कोई प्राणी कुशल भूमि को न जानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह कुशल भूमि के धर्म को जान ले। (321). यदि कोई प्राणी दूसरों को कुशल कर्म करते देखकर प्रसन्न न होता हो, ईर्ष्या करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रसन्न हो जाए। (322). यदि कोई प्राणी विभिन्न प्रकार से एक-दूसरे के विपरीत हों, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे अप्रतिहत प्रकाश प्राप्त करें। (323). यदि कोई प्राणी विभिन्न दुष्कर्म करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह दुष्कर्मों के फल को गहराई से समझ ले। (324). यदि कोई प्राणी जनसमूह से भयभीत होता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सिंहविक्रीडित समाधि को गहराई से समझ ले। (325). यदि कोई प्राणी चार मारों से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शीघ्र ही शूरंगम समाधि प्राप्त करे। (326). यदि कोई प्राणी बुद्धक्षेत्रों के प्रकाश को न देखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न अलंकरणों एवं प्रकाश युक्त समाधि को गहराई से समझ ले। (327). यदि कोई प्राणी घृणा एवं प्रेम का भाव रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह उपेक्षा का भाव रखे। (328). यदि कोई प्राणी बुद्ध धर्म का प्रकाश प्राप्त न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धर्मध्वज समाधि प्राप्त करे। (329). यदि कोई प्राणी महाप्रज्ञा से रहित हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धर्मोल्का समाधि प्राप्त करे। (330). यदि कोई प्राणी अज्ञान के अंधकार से ढका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सूर्यदीप प्रकाश समाधि प्राप्त करे। (331). यदि कोई प्राणी वाक्पटुता रहित हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न पुण्यों से युक्त प्रतिभान प्राप्त करे। (332). यदि कोई प्राणी रूप के संयोग को, जो जल के बुलबुले की तरह अस्थिर है, देखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह नारायण समाधि प्राप्त करे। (333). यदि कोई प्राणी चंचल एवं अस्थिर चित्त वाला हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह दृढ़ एवं निश्चित समाधि प्राप्त करे। (334). यदि कोई प्राणी बुद्ध के उष्णीष को देखना चाहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सुमेरुध्वज समाधि प्राप्त करे। (335). यदि कोई प्राणी अपने मूल प्रणिधान को त्याग चुका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह दृढ़ समाधि प्राप्त करे। (336). यदि कोई प्राणी अपनी अभिज्ञाएँ खो चुका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह वज्र समाधि प्राप्त करे। (337). यदि कोई प्राणी बोधिमंड के प्रति संदेह रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह वज्रमय बोधिमंड को समझ ले। (338). यदि कोई प्राणी सभी धर्मों के प्रति विरक्ति का भाव न रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह वज्र समाधि प्राप्त करे। (339). यदि कोई प्राणी दूसरों के चित्त को न जानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह दूसरों के चित्त को जान ले। (340). यदि कोई प्राणी विभिन्न इन्द्रियों की तीक्ष्णता एवं मंदता को न जानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह तीक्ष्णता एवं मंदता को जान ले। (341). यदि कोई प्राणी विभिन्न प्रकार के होने के कारण एक-दूसरे की भाषा न समझते हों, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे ध्वनि समाधि को समझ लें। (342). यदि कोई प्राणी धर्मकाय प्राप्त न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न शरीरों के भेद को समझ ले। (343). यदि कोई प्राणी बुद्ध के शरीर को न देखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अनिमेष समाधि प्राप्त करे। (344). यदि कोई प्राणी विभिन्न हेतु-प्रत्ययों का भेद करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अरण समाधि प्राप्त करे। (345). यदि कोई प्राणी धर्मचक्र प्रवर्तन के प्रति संदेह रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धर्मचक्र प्रवर्तन के प्रति चित्त को शुद्ध करे। (346). यदि कोई प्राणी अकारण मिथ्या आचरण करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धर्म के प्रकाश एवं हेतु-प्रत्यय के अनुसार आचरण करे। (347). यदि कोई प्राणी एक बुद्धक्षेत्र के प्रति शाश्वत दृष्टि रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह असंख्य बुद्धक्षेत्रों के भेद को भली-भाँति समझ ले। (348). यदि कोई प्राणी विभिन्न लक्षणों के कुशल-मूल रोपित न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न अलंकरणों से युक्त समाधि प्राप्त करे। (349). यदि कोई प्राणी सभी भाषाओं को भली-भाँति न समझ सकता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न भाषाओं के भेद को समझने वाली समाधि प्राप्त करे। (350). यदि कोई प्राणी एकाग्रचित्त होकर सर्वज्ञता की कामना करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अविभक्त धर्मधातु समाधि प्राप्त करे। (351). यदि कोई प्राणी धर्म से विमुख हो गया हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह दृढ़ समाधि प्राप्त करे। (352). यदि कोई प्राणी धर्मधातु को न जानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह महाप्रज्ञा प्राप्त करे। (353). यदि कोई प्राणी अपने मूल प्रणिधान से विचलित हो गया हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अच्युत समाधि प्राप्त करे। (354). यदि कोई प्राणी विभिन्न मार्गों का भेद करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह एक ही अविभक्त मार्ग प्राप्त करे। (355). यदि कोई प्राणी प्रज्ञा की खोज करता हो, आकाश के समान होना चाहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अकिंचन समाधि प्राप्त करे। (356). यदि कोई प्राणी सभी पारमिताओं से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शुद्ध पारमिताओं में स्थित हो। (357). यदि कोई प्राणी चार संग्रह वस्तुओं से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अद्भुत एवं कुशल संग्रह समाधि प्राप्त करे। (358). यदि कोई प्राणी चार अप्रमाण चित्तों का भेद करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह समभाव से युक्त वीर्य का अभ्यास करे। (359). यदि कोई प्राणी सैंतीस बोधिपक्षीय धर्मों से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह लोकोत्तर समाधि में स्थित हो। (360). यदि कोई प्राणी स्मृतिहीन एवं कुशल प्रज्ञा रहित हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह महासागर प्रज्ञामुद्रा समाधि प्राप्त करे। (361). यदि कोई प्राणी संदेहयुक्त हो, धर्म क्षान्ति उत्पन्न न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों की निश्चितता समाधि प्राप्त करे, क्योंकि सभी धर्म एक ही स्वरूप वाले हैं। (362). यदि कोई प्राणी सुने हुए धर्म को भूल जाता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अस्मृतिलोप समाधि प्राप्त करे। (363). यदि कोई प्राणी विभिन्न प्रकार से धर्मोपदेश देते हों, एक-दूसरे से प्रसन्न न होते हों, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे शुद्ध प्रज्ञाचक्षु प्राप्त करें, कोई संदेह न रहे। (364). यदि कोई प्राणी त्रिरत्न में श्रद्धा न रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह पुण्यवृद्धि समाधि प्राप्त करे। (365). यदि कोई प्राणी धर्मवृष्टि के लिए प्यासा हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह धर्मवृष्टि समाधि प्राप्त करे। (366). यदि कोई प्राणी त्रिरत्न में उच्छेद दृष्टि रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न रत्नों से अलंकृत समाधि प्राप्त करे। (367). यदि कोई प्राणी प्रज्ञा का कार्य न करता हो, वीर्य का अभ्यास न करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह वज्रमय प्रज्ञा समाधि प्राप्त करे। (368). यदि कोई प्राणी विभिन्न क्लेशों से बँधा हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह आकाशमुद्रा समाधि प्राप्त करे। (369). यदि कोई प्राणी आत्म एवं आत्मीय दृष्टि रखता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रज्ञामुद्रा समाधि प्राप्त करे। (370). यदि कोई प्राणी तथागत के पूर्ण पुण्यों को न जानता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह लोकविमुक्ति समाधि प्राप्त करे। (371). यदि कोई प्राणी अतीत में बुद्धों की पूजा न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह विभिन्न ऋद्धि-विक्रुर्वन प्राप्त करे। (372). यदि कोई प्राणी एक धर्मधातु द्वार को भविष्य के असंख्य कल्पों में कह न सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों के एक ही धर्मधातु होने का उपदेश देने में सक्षम हो। (373). यदि कोई प्राणी सभी सूत्रों में चयन न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों की समता एवं यथार्थ स्वरूप समाधि प्राप्त करे। (374). यदि कोई प्राणी छह सामंजस्य धर्मों से रहित हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी धर्मों की समाधि समझ ले। (375). यदि कोई प्राणी अचिन्त्य विमुक्ति द्वारों में वीर्य का अभ्यास न करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सभी अभिज्ञाओं में सिंहविक्रीडित समाधि प्राप्त करे। (376). यदि कोई प्राणी तथागतगर्भ में प्रवेश का भेद करना चाहता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, दूसरों से सुने बिना, वह तथागतगर्भ में प्रवेश का भेद कर ले। (377). यदि कोई प्राणी बोधिसत्त्व मार्ग में वीर्य का अभ्यास न करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रज्ञा प्राप्त करे। (378). (यदि कोई प्राणी बोधिसत्त्व मार्ग में वीर्य का अभ्यास न करता हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर) वह वीर्य का अभ्यास करे। (379). यदि कोई प्राणी जातक कथाएँ न देख सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सर्वत्रगामिनी प्रतिपद् समाधि प्राप्त करे। (380). यदि कोई प्राणी मार्ग पर चलते हुए अभी पूर्णता तक न पहुँचा हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह व्याकरण समाधि प्राप्त करे। (381). यदि कोई प्राणी तथागत की दस शक्तियों से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अक्षय समाधि प्राप्त करे। (382). यदि कोई प्राणी चार वैशारद्यों से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अक्षयमति समाधि प्राप्त करे। (383). यदि कोई प्राणी बुद्ध के अवेणिक धर्मों से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह अवेणिक धर्म समाधि प्राप्त करे। (384). यदि कोई प्राणी अमोघ दृष्टि से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह प्रणिधानवाक्य समाधि प्राप्त करे। (385). यदि कोई प्राणी सभी बुद्ध धर्म द्वारों को न जान सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह शुद्ध, निर्मल, निष्कलंक मुद्रा समाधि प्राप्त करे। (386). यदि कोई प्राणी सर्वज्ञता से युक्त न हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह सुविज्ञात समाधि प्राप्त करे। (387). यदि कोई प्राणी सभी बुद्धकार्यों को सिद्ध न कर सका हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वह असंख्य, अक्षयमति समाधि प्राप्त करे। (388). (ऐसे सभी प्राणी, बुद्ध धर्म में प्रत्येक विश्वास एवं समझ प्राप्त करें।) (389). कुछ बोधिसत्त्व, जिनका चित्त सरल एवं निष्कपट हो, बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे चौरासी हजार धर्म द्वार प्राप्त करें। (390). (कुछ बोधिसत्त्व... बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे) चौरासी हजार समाधि द्वार प्राप्त करें। (391). (कुछ बोधिसत्त्व... बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर, वे) पचहत्तर हजार धारणी द्वार प्राप्त करें। (392). असंख्य, अपरिमेय बोधिसत्त्व महासत्त्व जो महायान का अभ्यास करते हैं, यह धर्मोपदेश सुनकर, वे भी ऐसे ही असंख्य पुण्य प्राप्त करें। (393). (असंख्य, अपरिमेय बोधिसत्त्व महासत्त्व जो महायान का अभ्यास करते हैं, यह धर्मोपदेश सुनकर) वे अविवर्त्य भूमि पर स्थित हों। (394). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व, विभिन्न अलंकरणों एवं दृढ़ता की प्राप्ति के लिए, अचिन्त्य प्रणिधान करते हैं।) (395). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व, विभिन्न अलंकरणों एवं दृढ़ता की प्राप्ति के लिए) अचिन्त्य ज्ञान में वृद्धि कर स्वयं को अलंकृत करते हैं। (396). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) बत्तीस लक्षणों से अलंकृत होने के कारण, अस्सी अनुव्यंजन प्राप्त करते हैं। (397). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) मधुर ध्वनि से अलंकृत होने के कारण, सभी प्राणियों की इच्छानुसार धर्मोपदेश देते हैं, ताकि धर्मश्रवण करने वाले ज्ञान से संतुष्ट हों। (398). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) चित्त से अलंकृत होने के कारण, विभिन्न समाधियाँ प्राप्त करते हैं, और पीछे नहीं हटते। (399). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) स्मृति से अलंकृत होने के कारण, सभी धारणियों को नहीं खोते। (400). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) चित्त से अलंकृत होने के कारण, विभिन्न धर्मों का भेद कर सकते हैं। (401). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) स्मृति से अलंकृत होने के कारण, धूलिकणों के समान सूक्ष्म अर्थों को समझ सकते हैं। (402). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) कुशल चित्त से अलंकृत होने के कारण, दृढ़ प्रणिधान प्राप्त करते हैं। (403). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व, कुशल चित्त से अलंकृत होने के कारण, ) दृढ़ वीर्य (प्राप्त करते हैं)। (404). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व, कुशल चित्त से अलंकृत होने के कारण, ) अपनी इच्छानुसार पर किनारे पहुँचते हैं। (405). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) एकाग्रचित्त से अलंकृत होने के कारण, क्रमशः भूमियों को पार करते हैं। (406). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) दान से अलंकृत होने के कारण, सभी आवश्यक वस्तुओं का त्याग कर सकते हैं। (407). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) शील से अलंकृत होने के कारण, चित्त को शुभ, शुद्ध एवं निष्कलंक बनाते हैं। (408). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) क्षान्ति से अलंकृत होने के कारण, सभी प्राणियों के प्रति चित्त में कोई बाधा नहीं रखते। (409). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) वीर्य से अलंकृत होने के कारण, सभी सहायक कार्य सिद्ध कर सकते हैं। (410). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) ध्यान से अलंकृत होने के कारण, सभी समाधियों में सिंहविक्रीडित कर सकते हैं। (411). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) प्रज्ञा से अलंकृत होने के कारण, सभी क्लेशों की वासनाओं को जानते हैं। (412). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) मैत्री से अलंकृत होने के कारण, एकाग्रचित्त होकर सभी प्राणियों का स्मरण करते हैं। (413). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) करुणा से अलंकृत होने के कारण, सभी प्राणियों के दुःखों का निवारण कर सकते हैं। (414). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) मुदिता से अलंकृत होने के कारण, सभी धर्मों के प्रति चित्त में कोई संदेह नहीं रखते। (415). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) उपेक्षा से अलंकृत होने के कारण, अभिमान से मुक्त होते हैं, चित्त में कोई ऊँच-नीच का भाव नहीं रखते। (416). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) सभी अभिज्ञाओं से अलंकृत होने के कारण, सभी धर्मों में सिंहविक्रीडित कर सकते हैं। (417). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) पुण्यों से अलंकृत होने के कारण, अक्षय निधि रत्न हस्त प्राप्त करते हैं। (418). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) प्रज्ञा से अलंकृत होने के कारण, सभी प्राणियों के सभी चित्तों को जानते हैं। (419). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) मन से अलंकृत होने के कारण, उपायों से सभी प्राणियों को जागृत करते हैं। (420). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) प्रकाश से अलंकृत होने के कारण, प्रज्ञाचक्षु की स्पष्टता प्राप्त करते हैं। (421). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) विभिन्न प्रतिभानों से अलंकृत होने के कारण, प्राणियों को धर्म, अर्थ एवं युक्तियुक्त वचन प्राप्त कराते हैं। (422). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) अभय से अलंकृत होने के कारण, सभी मार बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते। (423). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) पुण्यों से अलंकृत होने के कारण, सभी बुद्ध भगवन्तों के सभी पुण्य प्राप्त करते हैं। (424). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) धर्म से अलंकृत होने के कारण, अप्रतिहत प्रतिभान प्राप्त करते हैं, सदा प्राणियों के लिए अद्भुत धर्म का उपदेश देते हैं। (425). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) प्रकाश से अलंकृत होने के कारण, सभी बुद्ध धर्म का प्रकाश प्राप्त करते हैं। (426). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) आलोक से अलंकृत होने के कारण, सभी बुद्धक्षेत्रों को सर्वत्र प्रकाशित कर सकते हैं। (427). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) परचित्तज्ञान से अलंकृत होने के कारण, सम्यक् ज्ञान प्राप्त करते हैं, कोई भ्रम नहीं रहता। (428). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) शिक्षाओं से अलंकृत होने के कारण, कहे अनुसार शीलों का पालन करते हैं। (429). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) ऋद्धि-पाद से अलंकृत होने के कारण, यथेच्छ गति से पर किनारे पहुँचते हैं। (430). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) सभी तथागतों के अलंकरणों को धारण करने से अलंकृत होने के कारण, तथागत के असंख्य धर्मकोष में प्रवेश करते हैं। (431). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) धर्म के सम्मान से अलंकृत होने के कारण, दूसरों की प्रज्ञा का अनुसरण नहीं करते। (432). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व) सभी कुशल धर्मों के अनुसार आचरण करने से अलंकृत होने के कारण, कहे अनुसार आचरण करते हैं। (433). (इसलिए सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व, सभी कुशल धर्मों के अनुसार आचरण करने से अलंकृत होने के कारण, कहे अनुसार आचरण करते हैं) और कामना करते हैं कि ऐसे सभी प्राणी इसी प्रकार के पुण्य और लाभ प्राप्त करें। (434). यदि असंख्य, अपरिमेय बोधिसत्त्व महासत्त्व महायान का अभ्यास करते हैं, मेरे द्वारा कहे गए एक वाक्य के कारण, वे सभी ऐसे ही शुभ, निर्मल कुशल धर्मों से युक्त हों, सभी पूर्ण हों। (435). इसी कारण से, सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व जो विभिन्न धर्मों में प्रज्ञा प्राप्त करते हैं, वह दूसरों से सुनकर प्राप्त नहीं होती। (436). (इसी कारण से, सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व जो विभिन्न धर्मों में प्रज्ञा प्राप्त करते हैं) वे महाधर्म प्रकाश की सिद्धि प्राप्त करते हैं। (437). (इसी कारण से, सभी बोधिसत्त्व महासत्त्व जो विभिन्न धर्मों में प्रज्ञा प्राप्त करते हैं) वे अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करते हैं।
1.11. विशिष्ट दुष्कर्म करने वाले प्राणियों तथा विभिन्न क्षमताओं वाले प्राणियों को शिक्षित करने की विधियों का प्रणिधान (438). हे भगवन्! यदि प्राणी अन्य लोकों में पंचानन्तर्य पाप करते हैं, यहाँ तक कि चार पाराजिक नियमों का उल्लंघन करते हैं, कुशल धर्मों को जला देते हैं, यदि वे श्रावक, प्रत्येकबुद्ध, महायान का अभ्यास करते हैं, प्रणिधान शक्ति के कारण, मेरे लोक में जन्म लेना चाहते हैं, जन्म लेने के बाद, पुनः सभी अकुशल कर्म करते हैं, स्थूल, निकृष्ट, दुष्ट होते हैं, उनका चित्त बलपूर्वक, कठिनता से दमित होने वाला होता है, वे चार विपर्यासों में आसक्त एवं कृपण होते हैं। ऐसे चौरासी हजार विभिन्न स्वभावों वाले, विक्षिप्त चित्त वाले प्राणियों के लिए, मैं उनके विभिन्न स्वभावों के अनुसार, चौरासी हजार धर्मस्कंधों का विस्तार से उपदेश दूँगा। (439). हे भगवन्! यदि कोई प्राणी अनुत्तर महायान का अभ्यास करता हो, तो मैं उसके लिए षट्पारमिताओं का, अर्थात् दानपारमिता से लेकर प्रज्ञापारमिता तक, पूर्ण एवं विस्तृत उपदेश दूँगा। (440). यदि कोई प्राणी श्रावकयान का अभ्यास करता हो, जिसने कुशल-मूल रोपित न किए हों, और बुद्धों को अपना गुरु बनाना चाहता हो, तो मैं उसे त्रिशरण में स्थापित करूँगा। (441). उसके बाद मैं उसे (श्रावकयान का अभ्यास करने वाले, जिसने कुशल-मूल रोपित न किए हों) षट्पारमिताओं में स्थित होने के लिए प्रेरित करूँगा। (442). यदि कोई प्राणी हत्या करना पसंद करता हो, तो मैं उसे अहिंसा में स्थापित करूँगा। (443). यदि कोई प्राणी दुष्ट लोभ करता हो, तो मैं उसे अचौर्य में स्थापित करूँगा। (444). यदि कोई प्राणी अवैध एवं मिथ्या काम करता हो, तो मैं उसे अमिथ्याचार में स्थापित करूँगा। (445). यदि कोई प्राणी जानबूझकर निंदा एवं झूठ बोलता हो, तो मैं उसे अमृषावाद में स्थापित करूँगा। (446). यदि कोई प्राणी उन्माद एवं मूर्खता पसंद करता हो, तो मैं उसे मद्यपान न करने में स्थापित करूँगा। (447). यदि कोई प्राणी इन पाँच कर्मों का उल्लंघन करता हो, तो मैं उसे उपासक के पंचशील ग्रहण कराऊँगा। (448). यदि कोई प्राणी कुशल धर्मों में प्रसन्न न होता हो, तो मैं उसे एक दिन और एक रात अष्टांग शील धारण कराऊँगा। (449). यदि कोई प्राणी अल्प कुशल-मूल वाला हो, और कुशल-मूलों के प्रति चित्त में प्रेम रखता हो, तो मैं उसे भविष्य में बुद्ध धर्म में प्रव्रजित होकर धर्म का अभ्यास करने में सक्षम करूँगा। (450). (मैं उसे भविष्य में बुद्ध धर्म में प्रव्रजित होकर धर्म का अभ्यास करने में सक्षम करूँगा) और उसे ब्रह्मचर्य युक्त दशशीलों में स्थापित करूँगा। (451). यदि कोई प्राणी कुशल-मूल धर्मों की कामना करता हो, तो मैं उसे कुशल-मूल धर्मों में स्थापित करूँगा। (452). (मैं उसे कुशल-मूल धर्मों में स्थापित करूँगा) ताकि वह ब्रह्मचर्य युक्त महाशील सिद्ध कर सके। (453). ऐसे प्राणी, जो पंचानन्तर्य पाप करते हैं, यहाँ तक कि कृपण होते हैं, इन प्राणियों के लिए, विभिन्न द्वारों से, ऋद्धि-प्रदर्शन करूँगा। (454). (इन प्राणियों के लिए, विभिन्न द्वारों से) विभिन्न वाक्यों एवं अर्थों का उपदेश दूँगा। (455). (इन प्राणियों के लिए, विभिन्न द्वारों से) स्कंध, धातु, आयतन, दुःख, शून्यता, अनित्यता, अनात्म का उपदेश दूँगा। (456). (इन प्राणियों के लिए, विभिन्न द्वारों से, स्कंध, धातु, आयतन आदि का उपदेश देने के बाद) उन्हें शुभ, अद्भुत, शांत, अभय निर्वाण में स्थापित करूँगा। (457). ऐसे चार प्रकार के अनुयायियों, भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका के लिए धर्मोपदेश दूँगा। (458). यदि कोई प्राणी वाद-विवाद सुनना चाहता हो, तो मैं सद्धर्म वाद का उपदेश दूँगा। (459). यहाँ तक कि जो मुक्ति चाहता हो, उसके लिए मैं शून्यता वाद का उपदेश दूँगा। (460). यदि कोई प्राणी सद्धर्म में प्रसन्न न होता हो, तो मैं उसके लिए विभिन्न सांसारिक कार्यों का उपदेश दूँगा। (461). यदि कोई प्राणी सद्धर्म में प्रेम रखता हो, तो मैं उसके लिए शून्यता समाधि का उपदेश देकर सम्यक् मुक्ति का प्रदर्शन करूँगा। (462). हे भगवन्! मैं ऐसे प्रत्येक प्राणी के लिए, निश्चय ही सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना जाऊँगा। (463). (मैं ऐसे प्रत्येक प्राणी के लिए, निश्चय ही सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना जाऊँगा) और असंख्य, अपरिमेय विभिन्न उपायों से, वाक्यों एवं अर्थों को समझाऊँगा। (464). (मैं ऐसे प्रत्येक प्राणी के लिए, निश्चय ही सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना जाऊँगा, और असंख्य, अपरिमेय विभिन्न उपायों से) ऋद्धि-प्रदर्शन करूँगा। (465). (मैं ऐसे प्रत्येक प्राणी के लिए, निश्चय ही सौ हजार योजन से अधिक दूरी तक, ऋद्धि-शक्ति का प्रयोग किए बिना जाऊँगा, और असंख्य, अपरिमेय विभिन्न उपायों से, वाक्यों एवं अर्थों को समझाऊँगा, ऋद्धि-प्रदर्शन करूँगा) यहाँ तक कि निर्वाण तक, चित्त में कभी ऊब नहीं होगी।
1.12. परिनिर्वाण तथा शरीर-धातुओं द्वारा प्राणियों के उद्धार का दीर्घकालिक प्रणिधान
1.12.1. परिनिर्वाण तथा सद्धर्म एवं प्रतिरूपक धर्म का संसार में रहना (466). हे भगवन्! मैं समाधि-शक्ति के कारण, प्राप्त आयु का पाँचवाँ भाग त्यागकर परिनिर्वाण प्राप्त करूँगा। (467). उस समय, मैं अपने शरीर को आधे सरसों के दाने के बराबर विभाजित करूँगा, प्राणियों पर दया करने के कारण, परिनिर्वाण की कामना करूँगा। (468). परिनिर्वाण के बाद, सद्धर्म एक हजार वर्ष तक संसार में रहेगा। (469). (परिनिर्वाण के बाद) प्रतिरूपक धर्म पाँच सौ वर्ष तक संसार में रहेगा।
1.12.2. निर्वाण के बाद प्राणियों द्वारा शरीर-धातुओं की पूजा तथा धर्मश्रवण से लाभ (470). मेरे निर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी, रत्नों एवं संगीत से शरीर-धातुओं की पूजा करे। (471). (मेरे निर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी) यहाँ तक कि (शरीर-धातुओं को) प्रणाम करे। (472). (मेरे निर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी, यहाँ तक कि) (शरीर-धातुओं की) एक बार प्रदक्षिणा करे। (473). (मेरे निर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी, यहाँ तक कि) हाथ जोड़कर (शरीर-धातुओं की) प्रशंसा करे। (474). (मेरे निर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी, यहाँ तक कि) एक फूल बिखेरकर (शरीर-धातुओं की पूजा करे)। (475). इस कारण से, अपनी इच्छानुसार, वे तीन यानों में प्रत्येक से पीछे नहीं हटेंगे। (476). मेरे परिनिर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी मेरे धर्म में, यहाँ तक कि एक शील भी, जैसा मैंने कहा है, धारण कर सके। (477). (मेरे परिनिर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी मेरे धर्म में) यहाँ तक कि एक चतुष्पदी गाथा का पाठ कर दूसरों को सुनाए। (478). (मेरे परिनिर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी मेरे धर्म में, यहाँ तक कि एक चतुष्पदी गाथा का पाठ कर दूसरों को सुनाए) ताकि सुनने वाला प्रसन्न हो। (479). (मेरे परिनिर्वाण के बाद, यदि कोई प्राणी मेरे धर्म में, यहाँ तक कि एक चतुष्पदी गाथा का पाठ कर दूसरों को सुनाए, ताकि सुनने वाला प्रसन्न हो, उसके बाद) धर्माचार्य की पूजा करे, यहाँ तक कि एक फूल या एक प्रणाम से। (480). इस कारण से, अपनी इच्छानुसार, वे तीन यानों में प्रत्येक से पीछे नहीं हटेंगे।
1.12.3. सद्धर्म के लोप के बाद शरीर-धातुओं में परिवर्तन तथा लाभ (481). यहाँ तक कि जब धर्म की ज्योति बुझ जाए, धर्म का ध्वज गिर जाए। सद्धर्म के लोप के बाद, मेरी शरीर-धातुएँ पृथ्वी में विलीन होकर वज्रमय सीमा तक पहुँच जाएँगी। (482). उस समय सहालोकधातु रत्नों से खाली हो जाएगा, मेरी शरीर-धातुएँ इच्छानुसार वैडूर्य रत्न में परिवर्तित हो जाएँगी, उनकी दीप्तिमान ज्वाला वज्रमय सीमा से निकलकर संसार में ऊपर अकनिष्ठ स्वर्ग तक पहुँचेगी। (483). (शरीर-धातु रत्न) विभिन्न प्रकार के फूल बरसाएँगे (मन्दारव पुष्प, महामन्दारव पुष्प, पारिजात पुष्प, मंजूषक पुष्प, महामंजूषक पुष्प)। (484). (जब शरीर-धातु रत्न विभिन्न प्रकार के फूल बरसाएँगे) तब रथ के पहिये के बराबर, सौ पंखुड़ियों वाला, हजार पंखुड़ियों वाला, या सौ हजार पंखुड़ियों वाला, या सौ हजार फूलों वाला शुद्ध प्रकाश सर्वत्र फैलेगा। (485). (शरीर-धातु रत्न द्वारा बरसाए गए फूल) पुनः अद्भुत सुगंध वाले, सूक्ष्म एवं सदा खिले रहने वाले होंगे, देखने वालों को कभी तृप्ति नहीं होगी। (486). उनकी दीप्तिमान ज्वाला अतुलनीय होगी, सूक्ष्म सुगंध असंख्य, अपरिमेय होगी, केवल ऐसे असंख्य फूल बरसेंगे। (487). जब वे बरसेंगे, तो पुनः विभिन्न प्रकार की सूक्ष्म ध्वनियाँ निकलेंगी (बुद्ध ध्वनि, धर्म ध्वनि, भिक्षु संघ ध्वनि, त्रिशरण ध्वनि, उपासक शील ध्वनि, अष्टांग शील सिद्धि ध्वनि, प्रव्रज्या दशशील ध्वनि, दान ध्वनि, शील ध्वनि, शुद्ध ब्रह्मचर्य युक्त महाशील ध्वनि, विभिन्न कार्यों में सहायता ध्वनि, सूत्र पाठ ध्वनि, ध्यान-चिन्तन ध्वनि, अशुद्धि ध्यान ध्वनि, श्वास-प्रश्वास स्मृति ध्वनि, नैवसंज्ञा नैवासंज्ञा ध्वनि, संज्ञा असंज्ञा ध्वनि, विज्ञान स्थान ध्वनि, आकाश स्थान ध्वनि, अष्ट अभिभू आयतन ध्वनि, दस कृत्स्नायतन ध्वनि, समाधि-प्रज्ञा ध्वनि, शून्यता ध्वनि, अलक्षण ध्वनि, अप्रणिहित ध्वनि, द्वादशांग प्रतीत्यसमुत्पाद ध्वनि, श्रावक कोष पूर्णता ध्वनि, प्रत्येकबुद्ध अभ्यास ध्वनि, महायान षट्पारमिता पूर्णता ध्वनि)। (488). रूपधातु के सभी देव इसे सुनेंगे, (मेरी कामना है कि) उनके पूर्वजन्म के सभी कुशल-मूल, वे स्वयं स्मरण करें। (489). (रूपधातु के सभी देव इसे सुनेंगे, मेरी कामना है कि) उनके सभी अकुशल कर्मों का वे शीघ्र ही पश्चाताप करें। (490). (रूपधातु के सभी देव इसे सुनेंगे, मेरी कामना है कि) वे शीघ्र ही सहालोकधातु में नीचे आकर, संसार के असंख्य प्राणियों को शिक्षित करें, सभी को दस कुशल कर्मों में स्थापित करें। (491). कामधातु के देव भी इसे सुनकर ग्रहण करेंगे, (मेरी कामना है कि) उनके सभी प्रेम-बंधन, कामेच्छाओं की तृष्णा, सभी चित्त-चैतसिक धर्म शांत हो जाएँ। (492). (कामधातु के देव भी इसे सुनकर ग्रहण करेंगे, मेरी कामना है कि) उनके पूर्वजन्म के सभी कुशल-मूल, वे स्वयं स्मरण करें। (493). (कामधातु के देव भी इसे सुनकर ग्रहण करेंगे, मेरी कामना है कि) उनके सभी अकुशल कर्मों का वे शीघ्र ही पश्चाताप करें। (494). (कामधातु के देव भी इसे सुनकर ग्रहण करेंगे, मेरी कामना है कि) वे शीघ्र ही सहालोकधातु में नीचे आकर, संसार के असंख्य प्राणियों को शिक्षित करें, सभी को दस कुशल कर्मों में स्थापित करें। (495). ऐसे सभी फूल आकाश में, पुनः विभिन्न प्रकार के रत्नों में परिवर्तित हो जाएँगे (सोना, चाँदी, मणि, मोती, वैडूर्य, शंख, कौड़ी, जेड, रत्न, सच्चे रत्न, नकली रत्न, गोमेद, प्रवाल, मुकुट, आभूषण), वर्षा की तरह बरसेंगे, और पूरे सहालोकधातु में सर्वत्र फैल जाएँगे। (496). (कामना करता हूँ कि) उस समय, लोग प्रसन्नचित्त हों। (497). (कामना करता हूँ कि उस समय, लोग) कोई झगड़ा न करें। (498). (कामना करता हूँ कि उस समय, लोगों को कोई) भूख न हो। (499). (कामना करता हूँ कि उस समय, लोगों को कोई) बीमारी न हो। (500). (कामना करता हूँ कि उस समय) अन्य दिशाओं के शत्रु, बुरे वचन और सभी विष, सभी समाप्त हो जाएँ और शांत हो जाएँ। (501). उस समय, लोक में ऐसा सुख हो। (502). यदि कोई प्राणी विभिन्न रत्नों को देखे, या स्पर्श करे या उपयोग करे, (तो मेरी कामना है कि) वे तीन यानों में पीछे न हटें। (503). ये सभी रत्न ऐसा लाभ करें, लाभ करने के बाद, पुनः पृथ्वी में विलीन होकर, अपने मूल स्थान वज्रमय सीमा पर पहुँच जाएँ।
1.12.4. तीन विपत्तियों के समय शरीर-धातुओं में परिवर्तन तथा लाभ (504). हे भगवन्! जब सहालोकधातु में शस्त्रकल्प आएगा, तो मेरी शरीर-धातुएँ पुनः नीले वैडूर्य रत्न में परिवर्तित होकर पृथ्वी से निकलेंगी, और अकनिष्ठ स्वर्ग तक पहुँचेंगी। (505). (मेरी शरीर-धातुएँ पुनः नीले वैडूर्य रत्न में परिवर्तित होकर) विभिन्न प्रकार के फूल बरसाएँगी, मन्दारव पुष्प, महामन्दारव पुष्प, पारिजात पुष्प। (506). (प्राणियों का हित करते हुए) यहाँ तक कि पुनः पृथ्वी में विलीन होकर, अपने मूल स्थान वज्रमय सीमा तक पहुँच जाएँगी, इसी प्रकार। (507). हे भगवन्! जैसे शस्त्रकल्प में (शरीर-धातुएँ परिवर्तित होकर उद्धार करती हैं), वैसे ही दुर्भिक्ष (कल्प आने पर, शरीर-धातुओं का परिवर्तन भी इसी प्रकार होगा)। (508). (जैसे शस्त्रकल्प, दुर्भिक्ष कल्प में, शरीर-धातुएँ परिवर्तित होकर उद्धार करती हैं), वैसे ही महामारी (कल्प आने पर, शरीर-धातुओं का परिवर्तन भी इसी प्रकार होगा)। (509). हे भगवन्! इस महान भद्रकल्प में, मेरे परिनिर्वाण के बाद, ये सभी शरीर-धातुएँ इस प्रकार बुद्धकार्य करेंगी, (कामना करता हूँ कि वे) असंख्य, अपरिमेय प्राणियों का दमन कर सकें, और उन्हें तीन यानों में अविवर्त्य बना सकें। (510). इस प्रकार, पाँच बुद्धक्षेत्रों के धूलिकणों की संख्या के बराबर महाकल्पों में, (कामना करता हूँ कि वे) असंख्य, अपरिमेय प्राणियों का दमन कर सकें, और उन्हें तीन यानों में अविवर्त्य बना सकें।
1.12.5. दीर्घकाल के बाद शिक्षित प्राणियों का बुद्ध बनना तथा कारण की प्रशंसा (511). हे भगवन्! यदि एक हजार गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के बाद, दसों दिशाओं के असंख्य, अपरिमेय अन्य लोकों में, बुद्ध बनकर प्रकट हों, तो वे सभी मेरे द्वारा अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि का अभ्यास करते समय शिक्षित किए गए होंगे, जिन्होंने पहली बार अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न किया होगा, और जिन्हें षट्पारमिताओं में स्थापित किया गया होगा। (512). हे भगवन्! अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करने के बाद, जिन्हें मैंने अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न करने के लिए प्रेरित किया होगा, और षट्पारमिताओं में स्थापित किया होगा, तथा निर्वाण के बाद शरीर-धातुओं के परिवर्तन द्वारा, जिन प्राणियों को अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न करने में सक्षम किया होगा, वे सभी प्राणी एक हजार गंगा-रेणु सम असंख्य कल्पों के बाद, दसों दिशाओं के असंख्य, अपरिमेय लोकों में बुद्ध बनकर प्रकट होंगे, (कामना करता हूँ कि वे) सभी मेरे नाम का उच्चारण कर प्रशंसा करें: "अतीत में बहुत पहले एक कल्प था जिसका नाम भद्र था, कल्प के आरम्भ में, चौथे भगवन् का नाम अमुक था, उन बुद्ध भगवन् ने हमें प्रेरित किया, और हमने पहली बार अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न किया। उस समय हमारे कुशल चित्त जल चुके थे, हमने अकुशल-मूल एकत्रित किए थे, पंचानन्तर्य पाप किए थे, यहाँ तक कि मिथ्या दृष्टि भी रखते थे, उन बुद्ध ने उस समय हमें प्रेरित किया, और हमें षट्पारमिताओं में स्थापित किया, इसी कारण से हमने सभी धारणी द्वारों को समझा, धर्मचक्र प्रवर्तन किया, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हुए, असंख्य, अपरिमेय सौ हजार प्राणियों को श्रेष्ठ फल में स्थापित किया, और पुनः असंख्य सौ हजार प्राणियों को स्वर्ग एवं मनुष्य लोक में, यहाँ तक कि मुक्ति फल में स्थापित किया।" (513). यदि कोई प्राणी बोधि मार्ग की कामना करता हो, मेरी प्रशंसा सुनकर, प्रत्येक बुद्ध से पूछेगा: "उन बुद्ध भगवन् ने क्या लाभ देखा, कि उन्होंने घोर पंचकषाय युक्त दुष्ट युग में, अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त की?" वे सभी भगवन्, उन बोधि मार्ग की कामना करने वाले सुपुरुषों एवं सुस्त्रियों को, मेरे अतीत में सिद्ध की गई महाकरुणा, प्रथम अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्तोत्पाद, लोक का अलंकरण तथा अद्भुत एवं कुशल प्रणिधानों के मूल कारण का उपदेश देंगे। (514). वे लोग सुनकर, आश्चर्यचकित होकर अभूतपूर्व कहकर प्रशंसा करेंगे, (कामना करता हूँ कि वे) शीघ्र ही अद्भुत प्रणिधान करें। (515). (वे लोग सुनकर, आश्चर्यचकित होकर अभूतपूर्व कहकर प्रशंसा करेंगे, कामना करता हूँ कि वे) सभी प्राणियों के प्रति महाकरुणा का भाव रखें, मेरे समान ही। (516). (वे लोग सुनकर, आश्चर्यचकित होकर अभूतपूर्व कहकर प्रशंसा करेंगे, कामना करता हूँ कि वे) यह प्रणिधान करें: "जो ऐसा घोर पंचकषाय युक्त युग हो, जिसमें प्राणी पंचानन्तर्य पाप करते हों, यहाँ तक कि सभी अकुशल-मूलों को सिद्ध करते हों, मैं उसमें उनका दमन करूँगा।" (517). वे सभी भगवन्, उन लोगों द्वारा महाकरुणा सिद्ध करने, पंचकषाय युक्त युग में विभिन्न कुशल प्रणिधान करने के कारण, (कामना करता हूँ कि वे) उनकी इच्छानुसार उन्हें व्याकरण दें। (518). हे भगवन्! वे बुद्ध भगवन्, पुनः महायान का अभ्यास करने वाले लोगों के लिए, मेरी शरीर-धातुओं द्वारा किए गए परिवर्तनों के मूल कारण का उपदेश देंगे: "अतीत में बहुत पहले एक बुद्ध भगवन् थे जिनका नाम अमुक था, उनके परिनिर्वाण के बाद, शस्त्र, रोग एवं दुर्भिक्ष कल्प आए, हम उस समय उस कल्प में विभिन्न दुःख भोग रहे थे, उन बुद्ध की शरीर-धातुओं ने हमारे लिए, विभिन्न ऋद्धि-प्रदर्शन एवं सिंहविक्रीडित किए, इसी कारण से हमने अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न किया, कुशल-मूल रोपित किए, परिश्रमपूर्वक षट्पारमिताओं का अभ्यास किया, जैसा कि ऊपर विस्तार से कहा गया है।"
2. "पाँच सौ प्रणिधानों" के बाद पूरक महाप्रणिधान (प्राणियों के स्थान पर दुःख भोगना तथा व्याकरण का अनुरोध)
(उस समय, रत्नसागर ब्राह्मण रत्नगर्भ बुद्ध के समक्ष, देवों, मनुष्यों एवं अमानुषों के विशाल जनसमूह के सामने, शीघ्र ही विशाल एवं अपरिमेय महाकरुणा चित्त को सिद्ध कर, पाँच सौ प्रणिधान करके, पुनः बुद्ध से कहा:)
2.1. यदि पूर्व प्रणिधान पूरे न हों, तो प्रतिज्ञा (519). हे भगवन्! यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो मैं भविष्य के भद्रकल्प में, घोर पंचकषाय युक्त, परस्पर कलहपूर्ण, अंतिम युग के अज्ञानी, जिन्हें कोई गुरु या उपदेश देने वाला न हो, जो विभिन्न दृष्टियों में पड़े हों, घोर अंधकार में पंचानन्तर्य पाप करते हों, जैसा कि ऊपर कहा गया है, अपने प्रणिधानों को सिद्ध कर बुद्धकार्य नहीं करूँगा। (520). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं अब बोधिचित्त का त्याग कर दूँगा। (521). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं अन्य बुद्धक्षेत्रों में कुशल-मूल रोपित करने की भी कामना नहीं करूँगा। (522). हे भगवन्! मैं अब इस प्रकार एकाग्रचित्त हूँ, (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं इस (अभ्यस्त) कुशल-मूल से (अन्य बुद्धक्षेत्रों या अप्रणिहित मलिन युगों में) अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त नहीं करूँगा। (523). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं प्रत्येकबुद्धयान की भी कामना नहीं करूँगा। (524). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं श्रावकयान की भी कामना नहीं करूँगा। (525). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) देवराज बनने की। (526). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) मनुष्यों का राजा बनने की। (527). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) पंचकामगुणों के सुख में आसक्त होकर स्वर्ग या मनुष्य लोक में जन्म लेने की। (528). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो) तो मैं गंधर्व बनने की कामना नहीं करूँगा। (529). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) असुर बनने की। (530). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) गरुड़ बनने की। (531). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) किन्नर बनने की। (532). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) महोरग बनने की। (533). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) यक्ष बनने की। (534). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) राक्षस बनने की। (535). (यदि मेरे प्रणिधान पूरे न हों और मुझे स्व-हित प्राप्त न हो, तो कामना नहीं करूँगा) विभिन्न नागराज आदि बनने की। (536). इस कुशल-मूल से मैं ऐसे स्थानों की कामना नहीं करूँगा।
2.2. यदि पूर्व प्रणिधान पूरे हों, कुशल-मूल एवं स्व-हित सिद्ध हो, तो प्रतिज्ञा (प्राणियों के स्थान पर दुःख भोगना) (हे भगवन्! यदि महान धन दान के कारण प्राप्त होता है, यदि स्वर्ग में जन्म शील के कारण प्राप्त होता है, यदि महान प्रज्ञा व्यापक अध्ययन के कारण प्राप्त होती है, यदि क्लेशों का नाश चिन्तन के कारण होता है, जैसा कि बुद्ध ने कहा है: "इस प्रकार की सभी वस्तुएँ स्व-हित एवं पुण्य वाले व्यक्ति अपनी इच्छानुसार प्राप्त कर सकते हैं।")
2.2.1. नरक के प्राणियों के लिए दुःख हरण एवं उनके स्थान पर दुःख भोगना (537). हे भगवन्! यदि मेरे कुशल-मूल सिद्ध हों और मुझे स्व-हित प्राप्त हो, तो मेरे सभी दान, शील, बहुश्रुतता, चिन्तन सभी सिद्ध होंगे, इस फल से सभी नरक के प्राणियों को लाभ होगा। (538). यदि कोई प्राणी अवीचि नरक में पड़ा हो, तो इस कुशल-मूल से, मैं उसका उद्धार करूँगा। (539). (अवीचि नरक से उद्धार किए गए प्राणियों को) मनुष्य लोक में जन्म दिलाऊँगा। (540). (मनुष्य लोक में जन्म लेने वाले प्राणियों को) बुद्ध का धर्मोपदेश सुनकर शीघ्र ही ज्ञान प्राप्त होगा। (541). (धर्मोपदेश सुनकर ज्ञान प्राप्त करने वाले प्राणियों को) अर्हत् बनाऊँगा। (542). (अर्हत् बनने वाले प्राणियों को) शीघ्र ही निर्वाण में प्रवेश कराऊँगा। (543). यदि इन (अवीचि नरक के) प्राणियों के कर्मफल समाप्त न हुए हों, तो मैं अपनी आयु का त्याग करूँगा। (544). (कर्मफल समाप्त न हुए प्राणियों के लिए) अवीचि नरक में प्रवेश कर उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा। (545). मेरी कामना है कि मेरा शरीर एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों के बराबर हो। (546). (कामना करता हूँ कि) प्रत्येक शरीर सुमेरु पर्वत के बराबर हो। (547). (कामना करता हूँ कि) प्रत्येक शरीर सुख-दुःख का अनुभव करे, जैसे मेरा यह शरीर सुख-दुःख का अनुभव करता है। (548). (कामना करता हूँ कि) प्रत्येक शरीर एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर, विभिन्न प्रकार के भारी एवं दुष्ट कष्टों का फल भोगे। (549). मैं अब एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों के बराबर, दसों दिशाओं के सभी बुद्धक्षेत्रों के प्राणियों के लिए, जो पंचानन्तर्य पाप करते हैं, अकुशल कर्म करते हैं, यहाँ तक कि अवीचि नरक में पड़ने वाले हैं, अवीचि नरक में उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा। (550). मैं अब यदि एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों के बराबर महाकल्पों के बाद, दसों दिशाओं के बुद्धक्षेत्रों के धूलिकणों की संख्या के बराबर सभी प्राणी, जो पंचानन्तर्य पाप करते हैं, अकुशल कर्म करते हैं, और अवीचि नरक में पड़ने वाले हैं, उनके लिए अवीचि नरक में उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा। (551). (जिनके स्थान पर मैं दुःख भोगता हूँ) उन सभी प्राणियों को नरक में न पड़ने दूँ। (552). (जिनके स्थान पर मैं दुःख भोगता हूँ उन प्राणियों को) बुद्धों से मिलने का अवसर मिले। (553). (जिनके स्थान पर मैं दुःख भोगता हूँ उन प्राणियों को) अद्भुत धर्म का उपदेश सुनने को मिले। (554). (जिनके स्थान पर मैं दुःख भोगता हूँ उन प्राणियों को) जन्म-मरण से मुक्त हों। (555). (जिनके स्थान पर मैं दुःख भोगता हूँ उन प्राणियों को) निर्वाण नगरी में प्रवेश करें। (556). मैं अब निश्चय ही इन (नरक में पड़ने वाले पंचानन्तर्य पाप करने वाले) प्राणियों के स्थान पर, लंबे समय तक सदा अवीचि नरक में रहूँगा।
2.2.2. अन्य बुरी गतियों तथा मनुष्यों में पीड़ित प्राणियों के स्थान पर दुःख भोगना (557). पुनः, एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर, दसों दिशाओं के लोकों के सभी प्राणी, जिनके दुष्कर्म सिद्ध हो चुके हैं, और जो निश्चय ही फल भोगेंगे, और अग्नि से जलते नरक में पड़ेंगे, (मैं भी अवीचि नरक की तरह उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा, ताकि वे मुक्त हो सकें, नीचे भी इसी प्रकार)। (558). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) जो बताए गए जलते नरक में पड़ेंगे (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (559). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) जो महा रौरव नरक में पड़ेंगे (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (560). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) जो संघात नरक में पड़ेंगे (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (561). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) जो कालसूत्र नरक में पड़ेंगे (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (562). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) जो संजीव नरक में पड़ेंगे (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (563). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए) तथा विभिन्न पशु-पक्षियों (के स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (564). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) प्रेत (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (565). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) दरिद्र (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (566). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) यक्ष (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (567). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) कुम्भाण्ड (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (568). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) पिशाच (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (569). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) असुर (होंगे, उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (570). (मैं ऊपर बताए गए समान संख्या में प्राणियों के लिए, जो) गरुड़ आदि होंगे, उनके साथ भी ऐसा ही होगा (उनके स्थान पर दुःख भोगूँगा)। (571). हे भगवन्! यदि एक बुद्धक्षेत्र के धूलिकणों की संख्या के बराबर, दसों दिशाओं के लोकों के, सभी प्राणी, जिनके दुष्कर्म सिद्ध हो चुके हैं, और जो निश्चय ही फल भोगेंगे, और मनुष्य लोक में बहरे (होंगे), मैं भी ऐसे प्राणियों के स्थान पर सभी पाप भोगूँगा, जैसा कि ऊपर कहा गया है। (572). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) अंधे (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (573). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) गूँगे (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (574). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) हाथ रहित (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (575). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) पैर रहित (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (576). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) विक्षिप्त चित्त एवं स्मृतिहीन (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (577). (मैं भी ऊपर बताए गए समान संख्या एवं स्थिति में, मनुष्य लोक में) अशुद्ध भोजन करने वाले (होंगे, उनके स्थान पर पाप भोगूँगा)। (578). पुनः, यदि कोई प्राणी अवीचि नरक में पड़कर विभिन्न दुःख भोगता हो, तो मैं लंबे समय तक उन प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, जैसे जन्म-मरण में प्राणी स्कंध (दुःख) भोगते हैं। (579). (मैं लंबे समय तक उन अवीचि नरक के प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर जैसे जन्म-मरण में प्राणी) धातु (दुःख भोगते हैं)। (580). (मैं लंबे समय तक उन अवीचि नरक के प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर जैसे जन्म-मरण में प्राणी) विभिन्न आयतन (दुःख भोगते हैं)। (581). (मैं लंबे समय तक) पशु-पक्षी (योनि के प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (582). (मैं लंबे समय तक) प्रेत (योनि के प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (583). (मैं लंबे समय तक) दरिद्र (प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (584). (मैं लंबे समय तक) यक्ष (प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (585). (मैं लंबे समय तक) कुम्भाण्ड (प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (586). (मैं लंबे समय तक) पिशाच (प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (587). (मैं लंबे समय तक) असुर (प्राणियों के स्थान पर विभिन्न दुःख भोगूँगा, उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)। (588). (मैं लंबे समय तक) गरुड़ आदि, सभी के साथ ऐसा ही होगा (उनके स्थान पर उनके स्कंध, धातु, विभिन्न आयतनों का दुःख भोगूँगा)।
2.3. सभी बुद्धों से साक्षी बनने, व्याकरण देने तथा शुभ लक्षणों के प्रदर्शन का अनुरोध करने की प्रतिज्ञा (589). हे भगवन्! यदि मेरे प्रणिधान सिद्ध हों और मुझे स्व-हित प्राप्त हो, और मैं अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि प्राप्त करूँ, जैसा कि ऊपर प्रणिधान किया गया है, तो (कामना करता हूँ कि) दसों दिशाओं के असंख्य, अपरिमेय लोकों में, जहाँ कहीं भी वर्तमान बुद्ध प्राणियों के लिए धर्मोपदेश दे रहे हों, वे सभी मेरे लिए साक्षी बनें। (590). (कामना करता हूँ कि) वे सभी बुद्ध (मेरे प्रणिधान एवं भविष्य की सिद्धि को) जानते एवं देखते हों। (591). हे भगवन्! मेरी केवल यह कामना है कि अब (रत्नगर्भ बुद्ध) मुझे अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि का व्याकरण दें। (592). (कामना करता हूँ कि मैं) भद्रकल्प में, जब मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष हो, तब बुद्ध बनकर प्रकट होऊँ। (593). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) तथागत। (594). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) अर्हत्। (595). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) सम्यक्संबुद्ध। (596). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) विद्याचरणसंपन्न। (597). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) सुगत। (598). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) लोकविद्। (599). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) अनुत्तर। (600). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) पुरुषदम्यसारथि। (601). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) शास्ता देवमनुष्याणाम्। (602). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) बुद्ध। (603). (कामना करता हूँ कि बुद्ध बनने पर मेरे नाम और उपाधियाँ पूर्ण हों) भगवत्। (604). हे भगवन्! यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो यह जनसमूह (तथागत को छोड़कर) सभी रोएँ। (605). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो) तथा देव एवं नाग (सभी रोएँ)। (606). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो) असुर आदि (चाहे पृथ्वी पर हों या आकाश में, सभी रोएँ)। (607). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो) केवल तथागत को छोड़कर, अन्य सभी रोएँ। (608). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह तथा देव, नाग, असुर आदि) सभी मेरे समक्ष, सिर झुकाकर प्रणाम करें। (609). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि) प्रशंसा करते हुए कहें: "साधु! साधु! महाकरुणा की सिद्धि अतुलनीय है।" (610). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि प्रशंसा करते हुए कहें:) "आपकी स्मृति अत्यंत गहन है, आपने सभी प्राणियों के लिए, ऐसी गहन करुणा उत्पन्न की है, और दृढ़ प्रणिधान किया है।" (611). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि प्रशंसा करते हुए कहें:) "आपने जो अब किया है, वह दूसरों की शिक्षा से नहीं है, बल्कि एकाग्रचित्त महाकरुणा से सभी को ढका है, और पंचानन्तर्य पाप करने वाले सभी अकुशल लोगों का संग्रह किया है।" (612). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि प्रशंसा करते हुए कहें:) "आपके कुशल प्रणिधानों को मैं अब सब जानता हूँ।" (613). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि प्रशंसा करते हुए कहें:) "जब आपने पहली बार अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि चित्त उत्पन्न किया, तब ही आपने प्राणियों के लिए महान औषधि का कार्य किया, उनके लिए आश्रय, सुरक्षा एवं आवास का कार्य किया, प्राणियों को मुक्ति दिलाने के लिए, आपने यह प्रणिधान किया।" (614). (यदि मैं निश्चय ही ऐसे बुद्धकार्य सिद्ध कर सकूँ, जैसा कि मेरा प्रणिधान है, तो जनसमूह आदि प्रशंसा करते हुए कहें:) "आपके प्रणिधान से यदि आपको स्व-हित प्राप्त होता है, तो तथागत आपको अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि का व्याकरण देंगे।"’
("पाँच सौ प्रणिधानों" के बाद पूरक महाप्रणिधान समाप्त, इस भाग में कुल 614 - 518 = 96 विस्तृत प्रणिधान।)
कुल (चक्रवर्ती पवित्र राजा के बोलने से पहले तक): 614 विस्तृत प्रणिधान।
उपसंहार: यह कहकर, उस समय चक्रवर्ती पवित्र राजा असीम निर्मलता, शीघ्र ही आसन से उठकर रोने लगे, आँसू बह निकले, हाथ जोड़कर, उस ब्राह्मण की ओर, सिर झुकाकर प्रणाम किया, और यह गाथा कही: “तुम्हारे प्रणिधान अब दृढ़ एवं गहन हैं, अपने सुख का त्याग कर, सभी प्राणियों के लिए, तुमने महाकरुणा का चित्त उत्पन्न किया है, और हमारे लिए प्रकट किया है, सभी धर्मों का वास्तविक, अद्भुत एवं श्रेष्ठ स्वरूप।”